पटना : बिहार में सोन नदी की लाल बालू के अवैध कारोबार पर लगाम लगाने के लिए घाटों पर निगरानी, ड्रोन, सीसीटीवी, ई-चालान, ट्रांजिट पास, वाहनों की जांच और स्टॉक सत्यापन जैसी व्यवस्थाएं लागू हैं। पुलिस-प्रशासन और खनन विभाग की संयुक्त कार्रवाई भी होती है। इसके बावजूद सोन की लाल रेत का अवैध कारोबार सालभर जारी रहने की शिकायतें सामने आती रहती हैं। सबसे बड़ी वजह निगरानी तंत्र की सीमाएं और संसाधनों की कमी मानी जा रही है।
एक तरफ अवैध बालू कारोबार से जुड़े संगठित गिरोहों के पास अत्याधुनिक हथियारों से लैस लोगों की बड़ी संख्या होने का आरोप है, वहीं दूसरी ओर खनन विभाग की सुरक्षा व्यवस्था सीमित जवानों पर निर्भर है। विभाग के पास लाठीधारी होमगार्ड और कुछ सैप जवान ही हैं। ऐसे में सोन नदी के करीब 177 घाटों के साथ-साथ सेकेंडरी लोडिंग प्वाइंट और भंडारण स्थलों की एक साथ निगरानी करना बड़ी चुनौती है।
घाटों पर व्यवस्था, लेकिन लोडिंग और स्टोरेज प्वाइंट पर सवाल
खनन विभाग ने वैध बालू घाटों पर सीसीटीवी कैमरे और ड्रोन से निगरानी की व्यवस्था की है। टेंडर लेने वालों के लिए भी निगरानी से जुड़ी कई शर्तें तय हैं। हालांकि, अवैध कारोबार का बड़ा हिस्सा घाटों से निकलकर सेकेंडरी लोडिंग प्वाइंट और भंडारण स्थलों तक पहुंचने के बाद संचालित होने की बात सामने आती रही है।
विभागीय अधिकारियों के मुताबिक, मौजूदा संसाधनों से अवैध रूप से बालू लदे ट्रक, हाइवा, ट्रैक्टर या नाव को जब्त करना संभव है, लेकिन पूरे संगठित नेटवर्क तक पहुंचना और उसे ध्वस्त करना चुनौतीपूर्ण है।
एक जिले में कार्रवाई, दूसरे जिले से शुरू हो जाता है खेल
सोन नदी के किनारे बसे इलाकों में बालू का कारोबार कई जिलों से जुड़ा हुआ है। ऐसे में एक जिले में कार्रवाई होने के बाद कारोबारी दूसरे जिले के घाट, लोडिंग प्वाइंट या स्टोरेज सेंटर का इस्तेमाल कर सकते हैं।
पटना क्षेत्र से निकाली गई सोन की लाल बालू को नाव के जरिए छपरा और कोईलवर क्षेत्र में उतारे जाने तथा वहां से ट्रक-ट्रैक्टर के माध्यम से अलग-अलग बाजारों तक पहुंचाए जाने की बात सामने आती रही है। इससे अलग-अलग जिलों की सीमाओं के बीच अवैध कारोबार पर प्रभावी निगरानी करना प्रशासन के लिए चुनौती बन जाता है।
अरवल में जरूरत से ज्यादा बालू मिलने से उठे सवाल
घाटों से निकाली गई बालू के ऑडिट के दौरान ईओयू की टीम ने अगस्त में अरवल जिले में भी अनियमितता का पता लगाया। जांच में वहां के वैध घाटों से निकाली गई मात्रा की तुलना में अधिक बालू मिलने की बात सामने आई। इस अतिरिक्त स्टॉक की कीमत करीब 1.63 करोड़ रुपये बताई गई।
यह मामला इस सवाल को भी सामने लाता है कि घाट से बालू निकलने के बाद उसका वास्तविक स्टॉक कहां पहुंचा और किस स्थान पर जमा हुआ, इसकी निगरानी का तंत्र कितना प्रभावी है।
सीसीटीवी से लेकर ड्रोन निगरानी तक, व्यवस्था पर सवाल
अवैध बालू खनन रोकने के लिए घाटों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं, ताकि खनन गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। लेकिन कैमरों के खराब रहने या उनकी नियमित लाइव मॉनीटरिंग को लेकर सवाल उठते रहे हैं। यह भी महत्वपूर्ण है कि किस घाट का कैमरा कितने समय से बंद है और उसकी मरम्मत कब हुई, इसका व्यवस्थित रिकॉर्ड कितना प्रभावी ढंग से रखा जा रहा है।
इसी तरह ड्रोन निगरानी का उद्देश्य नदी के बीच, सुनसान घाटों और छिपे हुए सेकेंडरी लोडिंग प्वाइंट की पहचान करना है। लेकिन ड्रोन से मिली रिपोर्ट के आधार पर कितनी कार्रवाई हुई, इसका समेकित और सार्वजनिक ब्योरा उपलब्ध होना भी निगरानी व्यवस्था की पारदर्शिता के लिए जरूरी है।
ऑफ सीजन में बढ़ जाता है अवैध खनन का खतरा
15 जुलाई से 15 अक्टूबर तक वैध बालू खनन बंद रहने के दौरान अवैध खनन का खतरा और बढ़ जाता है। ऐसे समय में घाटों और नदी क्षेत्र की निगरानी और अधिक सख्त किए जाने की जरूरत होती है। हालांकि, इस अवधि में सीसीटीवी और ड्रोन जैसी व्यवस्थाओं की सक्रिय निगरानी को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
ई-चालान और ट्रांजिट पास जैसी व्यवस्थाओं के बावजूद यदि बालू का अवैध स्टॉक दूसरे जिले में पहुंचकर खप जाता है, तो केवल परिवहन स्तर पर निगरानी से पूरे नेटवर्क पर अंकुश लगाना मुश्किल होगा। इसके लिए घाट से लेकर लोडिंग प्वाइंट, स्टोरेज और अंतिम बाजार तक एकीकृत निगरानी तंत्र की जरूरत है।







