डेस्क : बिहार में जमीन के फर्जीवाड़े का एक ऐसा नेटवर्क सामने आया है, जिसमें कथित तौर पर दशकों पुराने फर्जी दस्तावेज तैयार कर सरकारी और निजी जमीन पर कब्जे का रास्ता बनाया गया। इसके बाद रजिस्ट्री से लेकर दाखिल-खारिज यानी म्यूटेशन तक की प्रक्रिया को अंजाम देने के आरोप सामने आए हैं। जांच में कई जिलों में जमीन माफिया और सरकारी तंत्र के बीच संभावित सांठगांठ की भी पड़ताल की जा रही है।
बिहार में जमीन माफिया के खिलाफ चल रही जांच में जमीन कब्जे और राजस्व चोरी के कथित एक बड़े खेल की परतें खुलती नजर आ रही हैं। जांच से जुड़े मामलों में आरोप है कि कुछ गिरोहों ने 80 से 100 साल पुराने दिखने वाले फर्जी दस्तावेज तैयार कर जमीन पर अपना दावा खड़ा किया और फिर सरकारी रिकॉर्ड में दाखिल-खारिज कराने की कोशिश की।
रिपोर्ट के मुताबिक, यह खेल सिर्फ फर्जी कागज तैयार करने तक सीमित नहीं था। कई मामलों में जमीन की रजिस्ट्री कम कीमत दिखाकर कराए जाने और सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचाने के आरोप भी सामने आए हैं। जमुई, मुजफ्फरपुर, नालंदा और पटना समेत कई जिलों में ऐसे मामलों की जांच की जा रही है।
1924 और 1927 के दस्तावेजों से सरकारी जमीन पर दावा
जांच में सामने आए जमुई के एक मामले ने पूरे नेटवर्क की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, करीब 10 एकड़ सरकारी जमीन पर कब्जे के लिए वर्ष 1924 और 1927 के पुराने दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। जांच एजेंसियों को इन दस्तावेजों के फर्जी होने का संदेह है।
इसके बाद इस जमीन का दाखिल-खारिज कथित तौर पर एक गिरोह से जुड़े लोगों के नाम पर कराया गया। मामले में तत्कालीन अंचल अधिकारी, कर्मचारियों और राजस्व अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है।
फर्जी दस्तावेज से लेकर दाखिल-खारिज तक कैसे चलता था खेल?
जांच में सामने आए मामलों से जमीन माफिया के कथित तौर पर काम करने का एक पैटर्न सामने आता है।
पहले किसी जमीन के पुराने रिकॉर्ड या दस्तावेज का सहारा लिया जाता था। इसके बाद पुराने कागजों के आधार पर जमीन पर दावा खड़ा करने की कोशिश होती थी। कथित तौर पर दस्तावेजों को सरकारी रिकॉर्ड से जोड़ने के बाद दाखिल-खारिज की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती थी।
अगर रिकॉर्ड में नाम चढ़ गया तो आगे जमीन की खरीद-बिक्री और रजिस्ट्री को वैध दिखाने की कोशिश की जा सकती थी।
यही वजह है कि जांच एजेंसियां अब सिर्फ जमीन कब्जे की नहीं, बल्कि दस्तावेज तैयार करने से लेकर रजिस्ट्री और म्यूटेशन तक पूरी प्रक्रिया में शामिल लोगों की भूमिका की जांच कर रही हैं।
एक तिहाई कीमत पर रजिस्ट्री का भी आरोप
जमीन माफिया पर सिर्फ कब्जे का ही नहीं, बल्कि जमीन की कीमत कम दिखाकर रजिस्ट्री कराने का भी आरोप सामने आया है।
ईओयू की जांच के मुताबिक, जमुई में ऐसी जमीन की रजिस्ट्री का मामला सामने आया जिसकी सरकारी सर्किल रेट के आधार पर कीमत 14 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई, लेकिन रजिस्ट्री में कीमत करीब 6 करोड़ रुपये*ल दिखाई गई।
इसी तरह जांच में गुड्डू यादव और उसकी पत्नी के नाम पर जमुई और सिकंदरा में दर्ज 29 संपत्तियों का जिक्र है। इनका निबंधन मूल्य करीब 2.57 करोड़ रुपये बताया गया, जबकि सरकारी सर्किल रेट के हिसाब से इनकी कीमत करीब 7.59 करोड़ रुपये आंकी गई।
61 दस्तावेजों में भी सामने आया बड़ा अंतर
जांच रिपोर्ट के मुताबिक, गिरोह से जुड़े अन्य सदस्यों और उनके परिजनों के नाम पर 61 दस्तावेजों के जरिए संपत्तियों में करीब 3.37 करोड़ रुपये का निवेश दिखाया गया। वहीं सरकारी सर्किल रेट के अनुसार इन संपत्तियों का मूल्य करीब 6.65 करोड़ रुपये बताया गया है।
जांच एजेंसियां इन मामलों में रजिस्ट्री प्रक्रिया से जुड़े कर्मचारियों की भूमिका की भी पड़ताल कर रही हैं।
मुजफ्फरपुर और नालंदा में भी जांच तेज
जमीन से जुड़े ऐसे मामलों की जांच सिर्फ जमुई तक सीमित नहीं है। मुजफ्फरपुर में सरकारी कृषि भूमि के गलत तरीके से दाखिल-खारिज का मामला सामने आने के बाद तत्कालीन अंचल अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की गई थी।
कांटी और मुशहरी में भी जमीन कब्जे के मामलों में राजस्व पदाधिकारियों और कर्मचारियों की संभावित भूमिका की जांच चल रही है। वहीं नालंदा में छापेमारी के दौरान मिली संपत्तियों के निबंधन और दाखिल-खारिज से जुड़े रिकॉर्ड की भी जांच की जा रही है।
अब अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में
जमीन माफिया के इस कथित नेटवर्क की जांच में अब सरकारी तंत्र की भूमिका भी अहम हो गई है। भूमि एवं राजस्व विभाग और आर्थिक अपराध इकाई (EOU) द्वारा ऐसे मामलों में अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की जांच किए जाने की बात सामने आई है।
निबंधन विभाग की ओर से भी जमीन की वास्तविक कीमत और रजिस्ट्री में दिखाई गई कीमत के बीच अंतर की जांच तथा स्थल निरीक्षण जैसे कदमों पर जोर दिया जा रहा है।
जमीन मालिकों के लिए बड़ा सबक
बिहार में जमीन खरीदने या बेचने वालों के लिए ये मामले एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी हैं। सिर्फ पुराना कागज या रजिस्ट्री देखकर जमीन खरीद लेना पर्याप्त नहीं है। जमीन की पुरानी जमाबंदी, खाता-खेसरा, दाखिल-खारिज, स्वामित्व का इतिहास और सरकारी रिकॉर्ड की जांच बेहद जरूरी है।
खासकर ऐसी जमीन जिसके दस्तावेज कई दशक पुराने हों, उसके मामले में दस्तावेजों की प्रामाणिकता और वास्तविक स्वामित्व की स्वतंत्र रूप से जांच कराना जरूरी है।







