पटना : बिहार के विश्वविद्यालयों और अंगीभूत कॉलेजों में काम करने वाले री-डेजिग्नेटेड डेमोंस्ट्रेटर्स यानी पुनर्नामित प्रदर्शनकारियों को पटना हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वर्ष 1991 के बाद गैर-शिक्षण पदों से डेमोंस्ट्रेटर बनाए गए कर्मचारियों को शिक्षक का दर्जा, शिक्षकों के समान वेतनमान और दूसरे वित्तीय लाभ पाने का कानूनी अधिकार नहीं है। इस फैसले से बिहार के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में कार्यरत सैकड़ों कर्मचारियों की उम्मीदों को झटका लगा है।
दरअसल, जस्टिस हरीश कुमार की एकल पीठ ने शंकर प्रसाद शर्मा एवं अन्य की ओर से दायर कुल 96 याचिकाओं को खारिज कर दिया है। इन याचिकाओं में कर्मचारियों ने खुद को शिक्षक का दर्जा देने के साथ शिक्षकों के समान वेतनमान, पदोन्नति और अन्य वित्तीय लाभ देने की मांग की थी।
यह पूरा मामला वर्ष 1976 से 1991 के बीच बिहार के अलग-अलग विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में नियुक्त लैब असिस्टेंट, लैब टेक्नीशियन और लैब इंचार्ज से जुड़ा है। राज्य सरकार ने वर्ष 2006 में इन कर्मचारियों के पदों का पुनर्गठन करते हुए उन्हें डेमोंस्ट्रेटर के रूप में नामित किया था। इसके बाद बिहार राज्य विश्वविद्यालय संशोधन एवं विधिमान्यकरण अधिनियम, 2012 और सरकार के विभिन्न आदेशों के जरिए उनके पदनाम और वेतनमान को गैर-शिक्षण कर्मचारियों के अनुरूप सीमित कर दिया गया।
इसके खिलाफ कर्मचारियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसले, खासकर दुर्गा प्रसाद सिंह मामले में उनके पद, रैंक और वेतन की सुरक्षा की गई थी। इसलिए उन्हें शिक्षकों के समान वेतनमान और प्रमोशन का लाभ मिलना चाहिए।
हालांकि, पटना हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि वर्ष 2012 के संशोधन के तहत शिक्षक की कानूनी परिभाषा में प्रोफेसर, रीडर और लेक्चरर शामिल हैं। डेमोंस्ट्रेटर्स को इस श्रेणी में नहीं रखा गया है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 18 सितंबर 1975 से पहले स्वीकृत पदों पर नियुक्त डेमोंस्ट्रेटर्स के लिए कानून में विशेष प्रावधान है, लेकिन इन याचिकाकर्ताओं को इसका लाभ नहीं मिलेगा।
इस फैसले के बाद अब संबंधित कर्मचारियों को शिक्षक कैडर और यूजीसी के शिक्षक वेतनमान का लाभ मिलने का रास्ता बंद हो गया है। हाईकोर्ट के इस निर्णय से कर्मचारियों में निराशा है।







