पटना: बिहार में दलित आरक्षण और राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। बिहार सरकार में मंत्री संतोष कुमार सुमन ने RJD नेता तेजस्वी यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि दलितों को लेकर बयान देने से पहले उन्हें अपने माता-पिता के 15 साल के शासनकाल का हिसाब जनता के सामने रखना चाहिए।
संतोष सुमन ने दलित समाज के सबसे वंचित वर्गों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाने के लिए ‘कोटे में कोटा’ की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने इस मुद्दे पर तेजस्वी यादव से कई सवाल पूछे।
‘दलितों को ज्ञान देने से पहले हिसाब दें’
संतोष सुमन ने तेजस्वी यादव को निशाने पर लेते हुए कहा कि दलितों के हित और सामाजिक न्याय की बात करने से पहले यह बताना चाहिए कि पिछले 15 वर्षों में दलित समाज के लिए क्या किया गया।
उन्होंने कहा कि अब केवल राजनीतिक बयानबाजी से काम नहीं चलेगा। दलित समाज को काम और राजनीतिक भागीदारी का वास्तविक हिसाब चाहिए।
‘कोटे में कोटा’ पर क्यों जोर दे रहे संतोष सुमन?
मंत्री संतोष सुमन का तर्क है कि अनुसूचित जाति के भीतर भी कुछ समुदाय ऐसे हैं, जिन्हें आरक्षण का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया है।
उन्होंने मांझी, डोम, नट और हलखोर जैसे समुदायों का उल्लेख करते हुए कहा कि सबसे वंचित समूहों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाने के लिए अलग व्यवस्था पर विचार जरूरी है।
RJD से पूछा- सामान्य सीटों पर कितने दलितों को टिकट?
संतोष सुमन ने दलितों की राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर भी RJD से सवाल किया। उन्होंने पूछा कि सामान्य सीटों पर पार्टी ने कितने दलित उम्मीदवारों को चुनाव लड़ाया है।
इसके साथ ही उन्होंने राज्यसभा और विधान परिषद में दलित नेताओं की भागीदारी को लेकर भी सवाल उठाए।
उनका कहना है कि केवल आरक्षित सीटों पर दलित उम्मीदवारों को टिकट देना पर्याप्त नहीं है। राजनीतिक दलों को सामान्य सीटों पर भी दलित नेतृत्व को आगे बढ़ाने की जरूरत है।
आरक्षण पर क्या बोले संतोष सुमन?
संतोष सुमन ने कहा कि देश में आरक्षण की व्यवस्था सुरक्षित रहेगी और वंचित वर्गों को उनका अधिकार दिलाने की दिशा में प्रयास जारी रहेंगे।
उन्होंने ‘कोटे में कोटा’ को लेकर अपनी मांग दोहराते हुए कहा कि इसका उद्देश्य उन समुदायों तक लाभ पहुंचाना है, जो लंबे समय से आरक्षण के बावजूद पर्याप्त प्रतिनिधित्व से वंचित रहे हैं।
तेजस्वी से मांगा आंकड़ों के साथ जवाब
मंत्री ने तेजस्वी यादव से राजनीतिक बयानबाजी के बजाय आंकड़ों के साथ जवाब देने की मांग की। उनका कहना है कि दलित समाज अब केवल दावों और भाषणों के बजाय यह जानना चाहता है कि सत्ता और राजनीति में उसकी वास्तविक हिस्सेदारी कितनी रही है।
इस बयान के बाद बिहार में आरक्षण, दलित प्रतिनिधित्व और ‘कोटे में कोटा’ को लेकर सियासी बहस और तेज होने की संभावना है।
मुद्दा अब सिर्फ आरक्षण का नहीं, राजनीतिक हिस्सेदारी का भी
संतोष सुमन के बयान से साफ है कि बहस अब केवल आरक्षण के लाभ तक सीमित नहीं है। इसमें राजनीतिक प्रतिनिधित्व, चुनावी टिकट और दलित नेतृत्व का मुद्दा भी जुड़ गया है।
ऐसे में आने वाले दिनों में RJD और अन्य विपक्षी दलों की ओर से इस पर प्रतिक्रिया आने की संभावना है।
