पटना : पटना हाईकोर्ट ने तलाक से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी पत्नी को किसी अन्य पुरुष के साथ ‘आपत्तिजनक स्थिति’ में देख लेना मात्र व्यभिचार या विवाहेतर संबंध का कानूनी प्रमाण नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति और वास्तविक यौन संबंध साबित होने के बीच महत्वपूर्ण कानूनी अंतर है।
जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने मधुबनी फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए पति की तलाक की अपील खारिज कर दी। अदालत ने माना कि पति अपनी पत्नी के खिलाफ विवाहेतर संबंध का आरोप पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर साबित नहीं कर सका।
क्या है पूरा मामला?
मामला वर्ष 2006 में हुई एक शादी से जुड़ा है। दंपती के यहां वर्ष 2010 में एक बेटे का जन्म हुआ था। पति ने बाद में आरोप लगाया कि पत्नी के अपनी बड़ी बहन के पति के साथ अवैध संबंध थे।
पति का दावा था कि उसने दोनों को एक बार कथित तौर पर ‘आपत्तिजनक स्थिति’ में देखा था। इसी आरोप और कथित मानसिक क्रूरता के आधार पर उसने तलाक की मांग की थी।
पत्नी ने आरोपों को बताया झूठा
पत्नी ने पति के आरोपों से इनकार किया और कथित विवाहेतर संबंध के आरोपों को मनगढ़ंत बताया। उसने अदालत में कहा कि इस तरह के आरोप लगाना ही उसके प्रति मानसिक क्रूरता है।
मामले में पत्नी की ओर से पति पर जहर देकर जान से मारने की कोशिश का आरोप भी लगाया गया था। हालांकि, हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल पति द्वारा लगाए गए विवाहेतर संबंध के आरोपों के प्रमाण का था।
हाईकोर्ट ने सबूतों को क्यों माना महत्वपूर्ण?
अदालत ने पाया कि पति ने कथित घटना के बाद न तो पुलिस में शिकायत की और न ही स्थानीय थाने में कोई सनहा दर्ज कराया। इसके अलावा उसके परिवार या रिश्तेदारों की ओर से भी इस आरोप की पुष्टि करने वाला कोई ठोस समर्थन सामने नहीं आया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल किसी व्यक्ति का दावा या संदेह पर्याप्त नहीं है। विवाहेतर संबंध जैसे गंभीर आरोप को साबित करने के लिए परिस्थितिजन्य या अन्य विश्वसनीय साक्ष्य जरूरी हैं।
‘आपत्तिजनक स्थिति’ और यौन संबंध में अंतर
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि ‘आपत्तिजनक स्थिति’ में होना और ‘यौन संबंध’ स्थापित होना एक ही बात नहीं है।
अदालत के अनुसार, केवल परिस्थितियों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संबंधित लोगों के बीच शारीरिक संबंध भी बने थे। विवाहेतर संबंध के आरोप को केवल संभावना या अनुमान के आधार पर साबित नहीं माना जा सकता।
व्यभिचार साबित करने के लिए चाहिए स्पष्ट प्रमाण
पीठ ने पूर्व के न्यायिक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि व्यभिचार के आरोप को साबित करने के लिए स्पष्ट और विश्वसनीय प्रमाण जरूरी हैं। केवल पति का बयान या महज संभावना के आधार पर ऐसा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
अदालत ने यह भी माना कि इस मामले में पति की ओर से लगाए गए क्रूरता के आरोप मुख्य रूप से कथित विवाहेतर संबंध के आरोप पर आधारित थे। जब विवाहेतर संबंध ही साबित नहीं हुआ, तो क्रूरता के अन्य आरोप भी पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं हो सके।
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला रखा बरकरार
मधुबनी की फैमिली कोर्ट ने पहले ही पति की तलाक की याचिका खारिज कर दी थी। पटना हाईकोर्ट ने उस फैसले में कोई कानूनी त्रुटि नहीं पाई और पति की अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।







