पटना : बिहार की राजनीति में आरक्षण को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। पूर्व सांसद आनंद मोहन के पिछड़े वर्ग में भी ‘सामंत’ होने संबंधी बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो गई है। आनंद मोहन ने आरक्षण की समीक्षा की जरूरत बताते हुए कहा है कि वह आरक्षण के विरोधी नहीं हैं, लेकिन अब इसकी समीक्षा का समय आ गया है।
पूर्व सांसद का कहना है कि पिछड़े वर्ग में ऐसे लोग भी हैं, जो वर्षों से आरक्षण का लाभ लेते आ रहे हैं और अब सामाजिक एवं आर्थिक रूप से मजबूत हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे संपन्न लोगों को स्वयं आरक्षण का लाभ छोड़ने के बारे में विचार करना चाहिए, ताकि इसका फायदा जरूरतमंद लोगों तक पहुंच सके।
जरूरत पड़ी तो आरक्षण छोड़ने को तैयार: संतोष सुमन
वहीं, नरकटियागंज में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार सरकार में मंत्री संतोष कुमार सुमन ने भी आरक्षण को लेकर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ी तो वह व्यक्तिगत तौर पर आरक्षण छोड़ने के लिए तैयार हैं, लेकिन समाज के कमजोर तबके के अधिकार और सम्मान से किसी भी स्थिति में समझौता नहीं होना चाहिए।
संतोष सुमन के इस बयान को केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान के साथ चल रही आरक्षण संबंधी राजनीतिक बहस से जोड़कर देखा जा रहा है।
आरक्षण की समीक्षा को लेकर अलग-अलग तर्क
आनंद मोहन के बयान को पिछड़े वर्ग के भीतर सामाजिक और आर्थिक असमानता की ओर इशारा करने वाला माना जा रहा है। उनका तर्क है कि पिछड़ेपन का आकलन केवल जाति के आधार पर नहीं होना चाहिए, बल्कि व्यक्ति की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
उनका कहना है कि पिछड़े वर्ग में ऐसे परिवार भी हैं, जो लंबे समय से राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से प्रभावशाली हैं। ऐसे में आरक्षण का लाभ वास्तविक रूप से वंचित लोगों तक पहुंचाने की व्यवस्था पर चर्चा जरूरी है।
हालांकि, दलित और पिछड़े वर्ग से जुड़े नेताओं का तर्क है कि आरक्षण केवल आर्थिक सहायता का माध्यम नहीं है। यह ऐतिहासिक सामाजिक वंचना को दूर करने और समाज के वंचित वर्गों को प्रतिनिधित्व देने का संवैधानिक माध्यम है। ऐसे में केवल आर्थिक संपन्नता के आधार पर आरक्षण की आवश्यकता समाप्त करने की मांग को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
भाजपा नेता शिवेश कुमार ने भी रखी राय
इसी बहस के बीच भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवेश कुमार ने कहा कि समाज के जो लोग सक्षम हो चुके हैं, उन्हें स्वयं आरक्षण का लाभ छोड़ने पर विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि वह अपनी बेटी के लिए सरकारी नौकरी में आरक्षण का लाभ नहीं लेने की बात कह चुके हैं और चाहते हैं कि जरूरतमंद लोगों को आरक्षण का लाभ मिले।
उन्होंने यह भी कहा कि व्यक्तिगत स्तर पर आरक्षण का लाभ छोड़ना एक अलग विषय है, जबकि पूरे समुदाय के संवैधानिक अधिकारों को समाप्त करना अलग मुद्दा है। उनके मुताबिक, जब तक समाज में सभी वर्गों को समान अवसर उपलब्ध नहीं हो जाता, तब तक वंचित वर्गों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा जरूरी है।
आरक्षण को लेकर बिहार में नेताओं के इन बयानों के बाद राजनीतिक बहस और तेज होने के आसार हैं। एक ओर आरक्षण के लाभ को जरूरतमंदों तक सीमित करने की मांग उठ रही है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक प्रतिनिधित्व और ऐतिहासिक वंचना के आधार पर आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने की बात कही जा रही है।







