नालंदा : नालंदा जिले के इस्लामपुर नगर का अयोध्या धाम से विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक जुड़ाव रहा है। इसका प्रमुख कारण यह है कि देश के प्रथम रसिकाचार्य और श्री लक्ष्मण किला, अयोध्या धाम के संस्थापक अनन्य श्री स्वामी युगलानन्य शरण महाराज की जन्मभूमि इस्लामपुर मानी जाती है। इसी वजह से अयोध्या में इस्लामपुर को ‘छोटी अयोध्या’ के नाम से भी जाना जाता है।
जानकारों के अनुसार कार्तिक शुक्ल सप्तमी, विक्रम संवत 1818 में स्वामी युगलानन्य शरण महाराज का जन्म इस्लामपुर के राणा प्रताप नगर मोहल्ले में हुआ था। जन्म से ही वे तेजस्वी और विलक्षण प्रतिभा के धनी बताए जाते हैं। उनकी प्रतिभा को देखते हुए महज आठ वर्ष की आयु में उनका यज्ञोपवीत संस्कार कराया गया।
काशी से चित्रकूट तक की आध्यात्मिक यात्रा
स्वामी युगलानन्य शरण महाराज के पिता ने उनकी शिक्षा तत्कालीन प्रसिद्ध विद्वान पंडित हरिकृष्ण जी से कराई। गुरु से शिक्षा और उपदेश प्राप्त करने के दौरान उनका मन उपासना और आध्यात्मिक साधना की ओर आकर्षित होने लगा।
पिता की इकलौती संतान होने के बावजूद उन्होंने शिक्षा के बहाने काशी की यात्रा की। कुछ समय बाद वे छपरा स्थित अपने गुरु के पास पहुंचे। यहीं उन्होंने कम उम्र में युगल उपासना की दीक्षा प्राप्त की और इसके बाद चित्रकूट जाकर साधना में लीन हो गए।
कठिन साधना के बाद पहुंचे अयोध्या
संतों और धार्मिक परंपरा से जुड़े जानकारों के अनुसार स्वामी युगलानन्य शरण महाराज ने कठिन साधना के माध्यम से सीता-राम के प्रत्यक्ष दर्शन और सानिध्य की अनुभूति प्राप्त की। इसके बाद अपने आराध्य के निर्देश पर वे अयोध्या पहुंचे।
अयोध्या में उन्होंने भक्ति और साधना से जुड़े अनेक ग्रंथों की रचना की। उनके नाम से 92 विशिष्ट भक्ति ग्रंथों की रचना का उल्लेख मिलता है। इनमें श्री नाम कांति, धाम कांति, इश्क कांति, अवध महिमा और रघुवर गुण दर्पण सहित कई ग्रंथ शामिल बताए जाते हैं।
बताया जाता है कि उनके द्वारा रचित ग्रंथों का पाठ आज भी संत-महात्माओं और श्रद्धालुओं द्वारा किया जाता है। उनके साहित्य में रामभक्ति, माधुर्य भाव और आध्यात्मिक साधना की विशेष झलक मिलती है।
अंग्रेज अधिकारी भी करते थे सम्मान
स्वामी युगलानन्य शरण महाराज के व्यक्तित्व, विद्वत्ता और साधना से तत्कालीन अंग्रेज अधिकारी भी प्रभावित थे। धार्मिक परंपरा से जुड़े विवरणों के अनुसार तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने सरयू नदी के तट पर उन्हें भूमि ताम्रपत्र के माध्यम से समर्पित की थी।
रीवा के महाराज थे स्वामी जी के अनन्य भक्त
बताया जाता है कि रीवा राज्य के तत्कालीन नरेश महाराज रघुराज सिंह स्वामी युगलानन्य शरण महाराज के अनन्य भक्तों में शामिल थे। उनके दीवान दीनबंधु पांडेय ने स्वामी जी की इच्छा के विपरीत सरयू नदी के तट पर एक भव्य मंदिर और आश्रम का निर्माण कराया।
बाद में यही स्थान ‘श्री लक्ष्मण किला’ आचार्यपीठ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। आज यह स्थान अयोध्या की प्रमुख धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़े स्थलों में गिना जाता है।
1877 में साकेतधाम को हुए प्रस्थान
माधुर्य भाव और अनन्य रामभक्ति का संदेश फैलाने के बाद स्वामी युगलानन्य शरण महाराज ने 1877 ईस्वी में अपना भौतिक शरीर त्याग दिया और साकेतधाम को प्रस्थान किया, ऐसा धार्मिक परंपराओं में उल्लेख मिलता है।
आज भी याद किए जाते हैं स्वामी युगलानन्य शरण
स्वामी युगलानन्य शरण महाराज की जन्मभूमि इस्लामपुर और उनकी साधना स्थली अयोध्या के बीच आज भी धार्मिक संबंध कायम है। प्रत्येक वर्ष उनके जन्मदिन और पुण्यतिथि के अवसर पर अयोध्या स्थित श्री लक्ष्मण किला पीठ और इस्लामपुर स्थित श्री अयोध्या ठाकुरबाड़ी में धार्मिक आयोजन होते हैं।
इन आयोजनों में साधु-संतों और श्रद्धालुओं की मौजूदगी रहती है। इस दौरान स्वामी जी के रचित साहित्य, उनके सिद्धांतों और भक्ति मार्ग का स्मरण किया जाता है। इस्लामपुर की इसी आध्यात्मिक विरासत के कारण इसे अयोध्या से जुड़ा ‘छोटी अयोध्या’ का स्वरूप भी दिया जाता है।
