डेस्क : पूर्वी चंपारण के चकिया स्थित सीता कुंड धाम अपनी धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। यहां मौजूद एक खास पेड़ लोगों के बीच कौतूहल का विषय बना हुआ है। स्थानीय लोग इसे ‘खिचड़ी का पेड़’ कहते हैं। मान्यता है कि इसके फल चावल के दानों जैसे दिखाई देते हैं और इनका स्वाद खिचड़ी जैसा बताया जाता है।
भगवान राम और माता सीता से जुड़ा है सीता कुंड
पूर्वी चंपारण के चकिया प्रखंड में स्थित सीता कुंड धाम को भगवान राम और माता सीता से जुड़ी पौराणिक कथाओं का स्थल माना जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, अयोध्या लौटते समय भगवान राम की बारात कुछ समय के लिए यहां रुकी थी।
कहा जाता है कि इसी दौरान माता सीता ने यहां स्नान किया और भगवान शिव की पूजा के लिए शिवलिंग की स्थापना की। यही शिवलिंग आगे चलकर गिरजानाथ महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
माता सीता की ‘चौठारी’ से जुड़ी मान्यता
सीता कुंड से जुड़ी लोककथा के अनुसार, माता सीता की विदाई के बाद होने वाली ‘चौठारी’ रस्म भी इसी स्थान पर पूरी हुई थी। इसी वजह से यह स्थान स्थानीय श्रद्धालुओं के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखता है।
कैसे पड़ा ‘खिचड़ी के पेड़’ का नाम?
सीता कुंड धाम की सबसे दिलचस्प मान्यताओं में से एक यहां मौजूद पेड़ से जुड़ी है।
स्थानीय लोककथा के अनुसार, जब भगवान राम की बारात यहां ठहरी थी, तब बारातियों ने खिचड़ी का भोजन किया था। भोजन के बाद बची जूठन का कुछ हिस्सा जमीन पर गिर गया। मान्यता है कि इसी से बाद में एक पेड़ उग आया।
इस पेड़ पर आने वाले फल चावल के दानों जैसे दिखाई देते हैं। स्थानीय लोगों के बीच यह भी मान्यता है कि इन फलों का स्वाद खिचड़ी जैसा होता है। इसी वजह से इसे ‘खिचड़ी का पेड़’ कहा जाने लगा।
आस्था और लोकविश्वास का अनोखा संगम
स्थानीय लोगों के लिए यह पेड़ सिर्फ एक वनस्पति नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था और पीढ़ियों से चली आ रही लोककथा का हिस्सा है। हालांकि पेड़ और उसके स्वाद से जुड़ी बातें स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं, लेकिन इसकी कहानी सीता कुंड आने वाले श्रद्धालुओं के लिए खास आकर्षण बनी हुई है।
बारिश को लेकर भी है अनोखी मान्यता
सीता कुंड स्थित गिरजानाथ महादेव मंदिर से भी एक दिलचस्प लोकविश्वास जुड़ा है। स्थानीय लोगों के अनुसार, सूखे जैसी स्थिति आने पर आसपास के गांवों के लोग मंदिर में स्थापित शिवलिंग पर सीता कुंड का जल चढ़ाते हैं।
मान्यता है कि जब शिवलिंग पूरी तरह जल में डूब जाता है, तो इसके बाद बारिश होती है। स्थानीय लोगों का दावा है कि इस परंपरा को कई बार आजमाया गया है।
नवरात्रि में लगता है मेला
धार्मिक आयोजनों के दौरान सीता कुंड धाम में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। खासकर नवरात्रि के अवसर पर यहां मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें आसपास के क्षेत्रों के अलावा दूर-दराज से भी लोग पहुंचते हैं।
सीता कुंड धाम की पहचान धार्मिक आस्था के साथ-साथ यहां की अनोखी लोककथाओं से भी जुड़ी है। ‘खिचड़ी का पेड़’ इसी लोकविश्वास की एक ऐसी कहानी है, जो इस धाम को और भी रोचक बनाती है।







