डेस्क : उत्तर प्रदेश में निषाद आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर सियासी चर्चा के केंद्र में है। विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के प्रमुख मुकेश सहनी ने योगी सरकार से सवाल किया है कि जब देश के कुछ राज्यों में निषाद समाज की विभिन्न जातियों को अनुसूचित जाति (SC) आरक्षण का लाभ मिल रहा है, तो उत्तर प्रदेश में निषाद, मल्लाह, केवट, बिंद और अन्य संबंधित समुदायों को यह अधिकार क्यों नहीं मिल रहा?
मुकेश सहनी लंबे समय से निषाद समाज को आरक्षण देने की मांग उठाते रहे हैं। अप्रैल 2026 में लखनऊ में उन्होंने इस मुद्दे को लेकर योगी सरकार पर सवाल उठाए थे। इसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश में 101 दिनों की ‘निषाद आरक्षण संकल्प यात्रा’ निकालने का ऐलान भी किया।
आरक्षण को लेकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश
सहनी ने 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले निषाद समाज के आरक्षण के मुद्दे को प्रमुख राजनीतिक एजेंडे के तौर पर उठाया है। जुलाई 2026 में उन्होंने कहा था कि अगर निषाद समाज को आरक्षण नहीं मिला तो इसे लेकर राजनीतिक स्तर पर संघर्ष जारी रहेगा।
वहीं, हाल के महीनों में निषाद आरक्षण को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में दूसरे नेता भी सक्रिय रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मंत्री और निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद ने भी सितंबर 2026 में समुदाय के आरक्षण की मांग दोहराते हुए कहा कि राजनीतिक दलों को निषाद समाज के अधिकारों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए।
यूपी में आरक्षण का कानूनी पेच
निषाद आरक्षण का मामला केवल राजनीतिक मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें संवैधानिक और कानूनी पहलू भी जुड़े हैं। जून 2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले में कहा गया कि उत्तर प्रदेश में काहर, कश्यप, मल्लाह, निषाद और बिंद जैसी जातियां OBC के रूप में मान्य हैं और इन्हें अनुसूचित जाति सूची में शामिल करने के लिए संसद द्वारा कानून की आवश्यकता होगी।
यही वजह है कि यूपी में निषाद समाज को SC आरक्षण देने की मांग के साथ संवैधानिक प्रक्रिया और केंद्र की भूमिका का सवाल भी जुड़ जाता है।
2027 चुनाव से पहले बढ़ी राजनीतिक सक्रियता
उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव को देखते हुए निषाद समाज को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं। मुकेश सहनी की सक्रियता को इसी व्यापक राजनीतिक संदर्भ में देखा जा रहा है। अप्रैल 2026 में उन्होंने संजय निषाद को भी चुनौती दी थी कि वे केंद्र सरकार से निषाद आरक्षण दिलाने की दिशा में ठोस पहल करें।
ऐसे में आने वाले समय में निषाद आरक्षण का मुद्दा उत्तर प्रदेश की राजनीति में कितना बड़ा स्थान बनाता है, यह राजनीतिक दलों की रणनीति और सरकार की ओर से उठाए जाने वाले कदमों पर निर्भर करेगा।







