नई दिल्ली : केंद्र सरकार ने साेमवार काे उच्चतम न्यायालय में बताया कि उसने कैंसर रोधी दवाओं के ट्रेड मार्जिन को रेगुलेट करने का फैसला लिया है। इन दवाओं का ट्रेड मार्जिन अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के 30 प्रतिशत तक सीमित रहेगा, जिससे मरीज़ों को सालाना लगभग 2,500 करोड़ रुपये की बचत होगी।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि इस फ़ैसले पर 8 अक्टूबर को नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) की 151वीं बैठक में विचार किया गया था।
सरकार की ओर से न्यायालय को बताया गया कि देश में दवाओं की कीमतों को रेगुलेट करने के लिए एक व्यापक कानूनी और नीतिगत ढांचा मौजूद है। सरकार ने जनहित में दवाओं की उपलब्धता से समझौता किए बिना अत्यधिक ट्रेड मार्जिन पर रोक लगाने के लिए कई कदम उठाए हैं।
इससे पहले 29 सितंबर को उच्चतम न्यायालय ने जीवन रक्षक दवाओं की अत्यधिक कीमत (ओवरप्राइसिंग) वसूलने पर चिंता जताते हुए कैंसर की दवाओं पर 10 गुना तक मुनाफा कमाने को “नरसंहार” करार दिया था। न्यायालय ने कहा कि क्यों न दवाओं पर 16 फीसदी मार्जिन फिक्स कर दिया जाए?
न्यायालय ने यह भी कहा था कि फार्मा कंपनियों को मरीजों की कोई चिंता नहीं है। कैंसर दवा का ग्राहकों से लिया जाने वाला अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) 22,437 रुपये होता है। रिटेलर के लिए इसकी कीमत सिर्फ 3,520 रुपये होती है। यह सीधे-सीधे नरसंहार है। कॉरपोरेट अस्पताल उद्योग की तरह काम कर रहे हैं।
न्यायालय ने पूछा कि दवाओं की कीमत तय करने की व्यवस्था में ऐसा अंतर क्यों है? न्यायालय ने कहा कि आखिर ऐसी जरूरी दवाओं को मूल्य नियंत्रण से बाहर कैसे रखा जा सकता है। न्यायालय ने कहा कि 27 हजार रुपये एमआरपी वाली कैंसर की एक दवा का प्राइस टू रिटेलर करीब 3,000 रुपये है, जो अत्यधिक अंतर है।







