लखीसराय : बिहार के ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व को उजागर करने वाली एक महत्वपूर्ण खोज के तहत लखीसराय के बालगुदर टीला से 9वीं-10वीं सदी की पालकालीन शालभंजिका की जानकारी सामने आई है। यह प्रतिमा प्राचीन भारतीय मूर्तिकला और पालकालीन कला परंपरा के अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा सकती है।
क्या है शालभंजिका?
शालभंजिका भारतीय कला की एक पारंपरिक मूर्तिकला शैली है, जिसमें सामान्यतः किसी वृक्ष की शाखा को स्पर्श करती या उसके निकट आकर्षक मुद्रा में खड़ी स्त्री आकृति को दर्शाया जाता है। प्राचीन भारतीय मंदिरों, स्तूपों और स्थापत्य कला में ऐसी आकृतियां सौंदर्य, प्रकृति और समृद्ध कलात्मक परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं।
पालकालीन कला से जुड़ा है ऐतिहासिक महत्व
9वीं-10वीं सदी का काल पूर्वी भारत में पाल शासकों के शासन और कला-संस्कृति के विकास के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा है। पालकालीन कला अपनी विशिष्ट मूर्तिकला, धार्मिक प्रतिमाओं और उत्कृष्ट शिल्प परंपरा के लिए जानी जाती है।
बालगुदर टीला से मिली शालभंजिका इस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण कड़ी हो सकती है। ऐसी पुरातात्विक सामग्री से तत्कालीन समाज, कलात्मक अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक गतिविधियों के बारे में जानकारी प्राप्त करने में मदद मिलती है।
लखीसराय की विरासत पर बढ़ा ध्यान
बालगुदर टीला से जुड़ी यह जानकारी लखीसराय के पुरातात्विक महत्व को सामने लाती है। बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में मौजूद ऐतिहासिक स्थलों और पुरावशेषों का संरक्षण तथा वैज्ञानिक अध्ययन राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए आवश्यक है।
