पटना : बिहार में जमानत याचिकाओं के जल्द निपटारे को लेकर पटना हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में हाई कोर्ट ने जमानत और अग्रिम जमानत याचिकाओं के त्वरित निपटारे के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके तहत ऐसी याचिकाओं का निपटारा दाखिल होने की तारीख से अधिमानतः दो महीने के भीतर करने पर जोर दिया गया है। यदि किसी मामले में दो महीने से अधिक देरी होती है, तो संबंधित पीठासीन न्यायिक अधिकारी को आदेश में देरी के कारण दर्ज करने होंगे।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में पहल
पटना हाई कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर 21 अक्टूबर 2026 को जमानत याचिकाओं के शीघ्र निपटारे से संबंधित दिशा-निर्देश प्रकाशित किए गए। ये निर्देश सुप्रीम कोर्ट के 12 सितंबर 2025 के फैसले के अनुपालन में जारी किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जमानत और अग्रिम जमानत याचिकाओं का निपटारा जल्द किया जाना चाहिए और सामान्यतः दाखिल होने के दो महीने के भीतर इस पर फैसला करने का प्रयास होना चाहिए। हालांकि, पक्षकारों के कारण होने वाली देरी के मामलों में अपवाद हो सकता है।
दो महीने से अधिक देरी हुई तो बताना होगा कारण
नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, बिहार के जिला न्यायालयों में जमानत याचिकाओं के दाखिल होने और उनके निपटारे का मासिक विवरण तैयार किया जाएगा। संबंधित न्यायालय यह रिपोर्ट प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश को सौंपेंगे।
यदि किसी जमानत याचिका के निपटारे में दो महीने से अधिक समय लगता है, तो संबंधित न्यायिक अधिकारी को आदेश में देरी का कारण स्पष्ट करना होगा। इन रिपोर्टों की समीक्षा मासिक बैठकों में की जाएगी, ताकि लंबित मामलों की स्थिति पर नजर रखी जा सके।
जमानत याचिका दाखिल होते ही शुरू होगी तैयारी
दिशा-निर्देशों में अभियोजन पक्ष के साथ समन्वय को भी महत्वपूर्ण बताया गया है। जमानत या अग्रिम जमानत याचिका दाखिल करते समय लोक अभियोजक, अपर लोक अभियोजक या संबंधित अभियोजन अधिकारी को अग्रिम प्रति उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है।
इसके बाद अभियोजन पक्ष को केस डायरी और संबंधित स्थिति रिपोर्ट प्राप्त करने की प्रक्रिया शुरू करनी होगी, ताकि सुनवाई के समय अदालत को जरूरी दस्तावेज उपलब्ध हो सकें। केस डायरी उपलब्ध कराने के लिए पुलिस, अभियोजन और न्यायालय से जुड़े अधिकारियों के बीच बेहतर समन्वय पर भी जोर दिया गया है।
बिना ठोस कारण के नहीं मिलेगा स्थगन
दिशा-निर्देशों के मुताबिक, केवल वकील के अनुरोध पर जमानत मामलों में स्थगन नहीं दिया जाना चाहिए। विशेष परिस्थितियों में ही स्थगन पर विचार किया जा सकता है और इसके लिए संबंधित न्यायालय को स्पष्ट कारण दर्ज करने होंगे।
इस व्यवस्था का उद्देश्य अनावश्यक तारीखों से बचना और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों की सुनवाई में होने वाली देरी को कम करना है।
लंबित मामलों की निगरानी के लिए डैशबोर्ड का सुझाव
हाई कोर्ट के दिशा-निर्देशों में जिला और हाई कोर्ट स्तर पर जमानत याचिकाओं की लंबित स्थिति की निगरानी के लिए एक समर्पित डैशबोर्ड बनाने का सुझाव भी शामिल है। इसमें याचिकाओं को लंबित रहने की अवधि के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में रखा जा सकता है।
इससे यह पहचानने में मदद मिलेगी कि देरी केस डायरी, नोटिस की तामील, जवाब दाखिल करने, पक्षकारों द्वारा स्थगन मांगने या प्रशासनिक कारणों से हो रही है।
क्या होगा इसका असर?
इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य जमानत याचिकाओं के निपटारे में अनिश्चितकालीन देरी रोकना, न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों को प्राथमिकता देना है। हालांकि, दो महीने की अवधि को सामान्यतः अपनाई जाने वाली समय-सीमा के रूप में समझना चाहिए, न कि हर मामले में स्वतः लागू होने वाली पूर्ण समय-सीमा के रूप में।







