पश्चिम चम्पारण : एक ओर शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत 6 से 14 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने पर जोर दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर बगहा नगर के नरईपुर स्थित एक ऐतिहासिक विद्यालय में आज भी बच्चे बुनियादी सुविधाओं के अभाव में पढ़ने को विवश हैं।
विद्यालय में बच्चों के बैठने के लिए बेंच-डेस्क तक उपलब्ध नहीं हैं। पेयजल, शौचालय और किचेन शेड जैसी आवश्यक सुविधाओं का भी अभाव है। गर्मी, बरसात हो या ठंड, बच्चों को जमीन पर बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती है।
विडंबना यह है कि यह विद्यालय कोई नया संस्थान नहीं, बल्कि वर्ष 1922 में स्थापित है। अपने 104 वर्षों के इतिहास में इस विद्यालय ने कई ऐसे विद्यार्थियों को शिक्षा दी, जिन्होंने राजनीति, समाजसेवा, शिक्षा और प्रशासन के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। इसके बावजूद विद्यालय की वर्तमान स्थिति शिक्षा व्यवस्था और संबंधित विभागों की कार्यशैली पर सवाल खड़े करती है।
अनुशासन के लिए याद किए जाते हैं गुरुजी
विद्यालय में अध्ययन कर चुके 92 वर्षीय जगदम्बा मिश्र और 85 वर्षीय जलील मियां ने बताया कि आजादी के बाद विद्यालय के सरकारीकरण के उपरांत रामधारी सिंह पहले सरकारी शिक्षक के रूप में आए थे। उन्हें क्षेत्र के बुजुर्ग आज भी सम्मानपूर्वक ‘बुढ़वा गुरुजी’ के नाम से याद करते हैं। शिक्षा के प्रति उनकी निष्ठा और अनुशासन को लेकर उनका सख्त रवैया आज भी पूर्व विद्यार्थियों की स्मृतियों में जीवंत है।
इन बुजुर्गों के संस्मरण विद्यालय के गौरवशाली अतीत की कहानी कहते हैं। कभी यह संस्थान क्षेत्र में शिक्षा का प्रमुख केंद्र हुआ करता था, लेकिन आज यहां पढ़ने वाले बच्चों को न्यूनतम शैक्षणिक सुविधाओं के लिए भी इंतजार करना पड़ रहा है।
कई प्रमुख हस्तियों ने इसी विद्यालय में पाई शिक्षा
इस विद्यालय का इतिहास केवल इसकी स्थापना तक सीमित नहीं है। यहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों में बिहार सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री स्वर्गीय पूर्णमासी राम, पूर्व चेयरमैन रणजीत राव, पूर्व विधान पार्षद राजेश राम, समाजसेवी स्वर्गीय अखिलेश्वर मिश्र तथा डिग्री कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. रविकेश मिश्र जैसी हस्तियां शामिल रही हैं। इसके अतिरिक्त यहां से शिक्षा प्राप्त कर दर्जनों लोग शिक्षक, बिहार सरकार के अधिकारी और कर्मचारी बने। कई लोग सेवानिवृत्त हो चुके हैं, जबकि अनेक आज भी विभिन्न पदों पर कार्यरत हैं।
विद्यालय के पूर्व विद्यार्थी और सेवानिवृत्त शिक्षक रमेश मिश्र ने बताया कि उनके पिता ने भी इसी विद्यालय में शिक्षा प्राप्त की थी। उनके पिता ने विद्यालय में कुछ निर्माण कार्य भी कराए थे। यह तथ्य विद्यालय के साथ स्थानीय लोगों के पुराने जुड़ाव और इसके प्रति उनकी सामाजिक जिम्मेदारी को भी दर्शाता है।
विभाग और जनप्रतिनिधियों को सूचना, फिर भी परिणाम शून्य
रमेश मिश्र के अनुसार, विद्यालय की बदहाल स्थिति और बुनियादी सुविधाओं की कमी से संबंधित जानकारी शिक्षा विभाग तथा जनप्रतिनिधियों को दी जा चुकी है। इसके बावजूद अब तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है। उन्होंने चिंता जताई कि एक तरफ शिक्षा के अधिकार और बच्चों के सर्वांगीण विकास की बात की जाती है, वहीं दूसरी ओर ऐतिहासिक विद्यालय के विद्यार्थियों को बेंच-डेस्क, पेयजल और शौचालय जैसी आवश्यक सुविधाओं से वंचित रहना पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि ठंड शुरू होने से पहले यदि विद्यालय में बेंच-डेस्क सहित अन्य बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था सुनिश्चित नहीं की गई, तो जन आंदोलन शुरू किया जाएगा।
गरीब बच्चों के विद्यालय की उपेक्षा क्यों?
रमेश मिश्र का आरोप है कि शहर के मध्य में स्थित होने के बावजूद विद्यालय की उपेक्षा का एक प्रमुख कारण यहां पढ़ने वाले बच्चों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि है। उनके अनुसार, उच्च और मध्यम वर्ग के अधिकांश परिवार अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में पढ़ाते हैं, जबकि इस सरकारी विद्यालय में मुख्य रूप से निम्न आय वर्ग और मजदूर परिवारों के बच्चे शिक्षा प्राप्त करते हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सरकारी विद्यालयों की सुविधाएं वहां पढ़ने वाले बच्चों की आर्थिक स्थिति के आधार पर तय होनी चाहिए? शिक्षा का अधिकार प्रत्येक बच्चे को समान अवसर देने की बात करता है। सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले गरीब परिवारों के बच्चों को भी सम्मानजनक वातावरण, सुरक्षित परिसर और आवश्यक शैक्षणिक सुविधाएं मिलनी चाहिए।
अब प्रशासन की जवाबदेही का इंतजार
वर्ष 1922 में स्थापित नरईपुर का यह विद्यालय अपने गौरवशाली अतीत और वर्तमान बदहाली के बीच खड़ा है। यहां से शिक्षा प्राप्त कर कई लोगों ने समाज और शासन-प्रशासन में योगदान दिया, लेकिन आज इसी संस्थान के बच्चों को जमीन पर बैठकर पढ़ाई करनी पड़ रही है।
अब जरूरत है कि शिक्षा विभाग, स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधि विद्यालय की स्थिति का स्थलीय निरीक्षण करें तथा बेंच-डेस्क, स्वच्छ पेयजल, शौचालय और किचेन शेड जैसी आवश्यक सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करें। विद्यालय का गौरवशाली इतिहास तभी सार्थक होगा, जब यहां पढ़ने वाले वर्तमान बच्चों को भी बेहतर भविष्य गढ़ने के लिए सम्मानजनक शैक्षणिक वातावरण मिल सके।
