पटना : बिहार में युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाना और उन्हें आधुनिक तकनीक के अनुरूप कुशल बनाना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। राज्य में बड़ी संख्या में युवा रोजगार की तलाश में हैं, लेकिन डिजिटल कौशल, व्यावहारिक शिक्षा और उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप प्रशिक्षण की कमी उनके सामने बाधा बन रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल शैक्षणिक डिग्री हासिल करना पर्याप्त नहीं है। युवाओं को रोजगार के लिए तैयार करने के उद्देश्य से शिक्षा व्यवस्था में तकनीकी प्रशिक्षण और व्यावहारिक अनुभव को अधिक महत्व देना होगा।
डिजिटल शिक्षा की कमी बन रही चुनौती
आज के दौर में कंप्यूटर, इंटरनेट और डिजिटल तकनीक का ज्ञान लगभग हर क्षेत्र में जरूरी होता जा रहा है। बैंकिंग, स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यापार और सरकारी सेवाओं से लेकर निजी कंपनियों तक में डिजिटल दक्षता की मांग बढ़ी है। इसके बावजूद कई स्कूलों में कंप्यूटर और आधुनिक तकनीकी सुविधाओं की उपलब्धता सीमित है। इससे विद्यार्थियों को शुरुआती स्तर पर ही डिजिटल शिक्षा का पर्याप्त अनुभव नहीं मिल पाता।
ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों के सामने यह समस्या और गंभीर हो सकती है, जहां संसाधनों और इंटरनेट की उपलब्धता में अंतर देखने को मिलता है। ऐसे में स्कूल स्तर से ही कंप्यूटर शिक्षा, डिजिटल साक्षरता और तकनीकी प्रशिक्षण को मजबूत करने की जरूरत है।
डिग्री के साथ व्यावहारिक कौशल भी जरूरी
रोजगार बाजार में कंपनियां अब केवल शैक्षणिक योग्यता के आधार पर उम्मीदवारों का चयन नहीं करतीं, बल्कि उनके व्यावहारिक ज्ञान, संवाद कौशल, समस्या सुलझाने की क्षमता और तकनीकी दक्षता को भी महत्व देती हैं। यदि युवाओं को पढ़ाई के दौरान ही इन कौशलों का प्रशिक्षण मिले, तो उनके लिए रोजगार के अवसर तलाशना आसान हो सकता है।
इसके लिए स्कूलों, कॉलेजों और तकनीकी संस्थानों में कौशल आधारित पाठ्यक्रमों को बढ़ावा देना जरूरी है। विद्यार्थियों को प्रोजेक्ट, इंटर्नशिप और कार्यस्थल से जुड़े अनुभव उपलब्ध कराने से उन्हें वास्तविक कामकाज की समझ मिल सकती है।
अप्रेंटिसशिप और उद्योगों से जुड़ाव पर जोर
युवाओं को रोजगार के लिए तैयार करने में अप्रेंटिसशिप की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। इसके माध्यम से विद्यार्थी और नए अभ्यर्थी उद्योगों में काम करने का अनुभव हासिल कर सकते हैं। बिहार में शैक्षणिक संस्थानों और स्थानीय उद्योगों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित कर प्रशिक्षण के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं।
इसके साथ ही रोजगारपरक पाठ्यक्रमों को स्थानीय जरूरतों से जोड़ना होगा, ताकि प्रशिक्षित युवाओं को राज्य के भीतर भी काम के अवसर मिल सकें।
आंकड़ों के आधार पर नीति बनाने की जरूरत
पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) 2025, यूडीआईएसई प्लस 2025-26 और नीति आयोग की रिपोर्ट जैसे स्रोत रोजगार, शिक्षा और कौशल विकास की स्थिति को समझने में उपयोगी हो सकते हैं। इन आंकड़ों के आधार पर यह आकलन किया जा सकता है कि किन क्षेत्रों में प्रशिक्षण की कमी है और किन वर्गों तक शिक्षा एवं रोजगार के अवसर पर्याप्त रूप से नहीं पहुंच पा रहे हैं।
कुल मिलाकर, बिहार में युवाओं के भविष्य को मजबूत बनाने के लिए स्कूलों में डिजिटल सुविधाओं का विस्तार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास और अप्रेंटिसशिप को एक साथ आगे बढ़ाना जरूरी है। इससे युवाओं की रोजगार क्षमता बढ़ाने और राज्य के आर्थिक विकास को गति देने में मदद मिल सकती है।







