मुजफ्फरपुर: बिहार विधान परिषद के तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से नवनिर्वाचित विधान पार्षद बंशीधर ब्रजवासी इन दिनों राजनीतिक चर्चा के केंद्र में हैं। लगातार दूसरी बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीत दर्ज करने के बाद 31 अक्टूबर को उनके भाजपा से जुड़ने की खबर सामने आई। इस घटनाक्रम ने बिहार की सियासत में नई बहस छेड़ दी है। खासकर इसलिए कि उन्होंने चुनाव में जदयू समर्थित उम्मीदवार अभिषेक झा को हराया था।
इस बीच अभिषेक झा की एक सोशल मीडिया पोस्ट भी चर्चा में है। उन्होंने अपनी हार के बाद लिखा, ‘मन में कभी-कभी यह सवाल भी उठता है कि क्या मैं अपने ही परिवार के भीतर रचे गए चक्रव्यूह में अभिमन्यु की तरह अकेला पड़ गया।’ उनके इस बयान को एनडीए के भीतर संभावित असंतोष से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, यह उनकी व्यक्तिगत प्रतिक्रिया है और इससे गठबंधन के भीतर किसी साजिश की पुष्टि नहीं होती।
कौन हैं बंशीधर ब्रजवासी?
बंशीधर ब्रजवासी ने मिथिला विश्वविद्यालय से परास्नातक की पढ़ाई की है। उनके सार्वजनिक जीवन की शुरुआत वर्ष 2005 में हुई, जब वे शिक्षामित्र बने। अपने गांव के स्कूल में नियुक्ति के बाद उन्होंने शिक्षामित्रों की सेवा को पूर्णकालिक करने और उनके अधिकारों से जुड़े मुद्दे उठाने शुरू किए।
उस समय शिक्षामित्रों की नियुक्ति 11 महीने के लिए होती थी। ब्रजवासी ने इस व्यवस्था में बदलाव की मांग को लेकर आंदोलन किया। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षक संघ का गठन किया और शिक्षकों के हितों के लिए आवाज उठाई। वर्ष 2006 में अनशन के जरिए भी उन्होंने अपनी मांगों को आगे बढ़ाया। धीरे-धीरे वे शिक्षक आंदोलन का एक जाना-पहचाना चेहरा बन गए।
केके पाठक से टकराव के बाद चली गई थी नौकरी
बंशीधर ब्रजवासी के जीवन में जुलाई 2024 का घटनाक्रम अहम मोड़ साबित हुआ। उस समय शिक्षा विभाग के तत्कालीन अपर मुख्य सचिव केके पाठक के साथ विवाद के बाद उन्हें नौकरी से हटा दिया गया था।
नौकरी जाने के बाद उन्होंने राजनीति में अपनी किस्मत आजमाने का फैसला किया। नवंबर 2024 में तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के उपचुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरे और जीत हासिल की। इसके बाद 2026 के चुनाव में भी उन्होंने अपनी सीट बरकरार रखी। इस तरह शिक्षक आंदोलन से शुरू हुआ उनका सफर विधान परिषद तक पहुंचा।
भाजपा से जुड़ने के फैसले पर क्यों मचा बवाल?
31 अक्टूबर को बंशीधर ब्रजवासी के भाजपा कार्यालय पहुंचने और पार्टी से जुड़ने की घोषणा की खबर सामने आई। इस घटनाक्रम को लेकर भाजपा और विपक्षी दलों की ओर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आईं। हालांकि, 1 नवंबर को उनके भाजपा की सदस्यता को लेकर रुख पर विरोधाभासी खबरें भी सामने आईं। ऐसे में उनके राजनीतिक कदम की स्थिति को लेकर चर्चा जारी है।
भाजपा के पूर्वी जिलाध्यक्ष विवेक कुमार ने ब्रजवासी के साथ आने को पार्टी के प्रति बढ़ते समर्थन से जोड़कर देखा। उनका कहना है कि भाजपा के साथ जुड़कर ब्रजवासी क्षेत्र के लोगों की समस्याओं को बेहतर तरीके से उठा सकते हैं।
वहीं, राजद के जिलाध्यक्ष रमेश गुप्ता ने उनके फैसले की आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि ब्रजवासी ने शिक्षकों के आक्रोश और उनके समर्थन के आधार पर चुनाव में वोट हासिल किए थे। अब भाजपा के साथ जाने का कदम शिक्षकों और प्रबुद्ध मतदाताओं के भरोसे पर सवाल खड़ा करता है।
कांग्रेस के पूर्वी जिलाध्यक्ष अरविंद कुमार मुकुल ने भी उनके फैसले पर निशाना साधा। उन्होंने इसे मतदाताओं से वादाखिलाफी करार दिया।
अभिषेक झा की पोस्ट ने बढ़ाई एनडीए में खींचतान की चर्चा
तिरहुत स्नातक सीट पर बंशीधर ब्रजवासी ने जदयू समर्थित उम्मीदवार अभिषेक झा को 9,147 मतों से हराया था। ब्रजवासी को 31,832 वोट मिले, जबकि अभिषेक झा को 22,685 मत प्राप्त हुए। हार के बाद अभिषेक झा ने सोशल मीडिया पोस्ट में करीब 4,700 मतों के अमान्य होने का दावा भी किया और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने अपने राजनीतिक परिवार के भीतर अकेले पड़ जाने की आशंका भी जताई।
उनकी इस पोस्ट के बाद भाजपा और जदयू के बीच तालमेल को लेकर चर्चाएं तेज हुई हैं। हालांकि, अभिषेक झा ने अपने संदेश में बंशीधर ब्रजवासी को जीत की बधाई भी दी और कहा कि चुनाव में हार-जीत से उनके राजनीतिक रिश्ते और जनता के प्रति जिम्मेदारी खत्म नहीं होती।
शिक्षक आंदोलन से राजनीतिक पहचान तक
बंशीधर ब्रजवासी का सफर शिक्षामित्र की नौकरी से शुरू होकर शिक्षक आंदोलन और फिर विधान परिषद तक पहुंचा है। शिक्षक हितों के मुद्दों ने उन्हें पहचान दिलाई और चुनावी राजनीति में भी उनका आधार तैयार किया। अब भाजपा से जुड़ने के घटनाक्रम और उस पर उठ रहे सवालों ने उन्हें एक बार फिर बिहार की राजनीति में चर्चा का विषय बना दिया है।
