डेस्क : केंद्र सरकार ने 100 प्रतिशत इथेनॉल (शुद्ध इथेनॉल) से चलने वाले फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए रास्ता खोल दिया है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने केंद्रीय मोटर वाहन नियमों में संशोधन करते हुए इस संबंध में अधिसूचना जारी की है। इसके बाद विशेष रूप से डिजाइन और प्रमाणित वाहनों में ई100 ईंधन के इस्तेमाल को आधिकारिक मंजूरी मिल सकेगी। कुछ वाहन निर्माता कंपनियां भी अपने ई100 मॉडल बाजार में उतारने की तैयारी कर रही हैं।
क्या सभी पेट्रोल वाहन ई100 पर चल सकेंगे?
नए नियमों का यह मतलब नहीं है कि सभी पेट्रोल कारें ई100 ईंधन का इस्तेमाल कर सकेंगी। फिलहाल ई20 (20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) पर चलने वाले सामान्य वाहन ई85 या ई100 ईंधन के अनुकूल नहीं हैं। केवल उन्हीं वाहनों में इन ईंधनों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जिन्हें अधिक मात्रा में इथेनॉल मिश्रण के लिए विशेष रूप से डिजाइन और प्रमाणित किया गया है। ऐसे वाहनों को फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल (एफएफवी) कहा जाता है।
अब क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?
भारत ने राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति के तहत पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण (ई20) का लक्ष्य पहले 2030 तक हासिल करने का फैसला किया था। हालांकि, 2022 में इसमें संशोधन कर समयसीमा घटाकर 2025-26 कर दी गई। एक अप्रैल 2026 से देशभर के सभी ईंधन केंद्रों पर ई20 अनिवार्य मानक बन गया है। इसके साथ ही शुद्ध पेट्रोल और ई10 मिश्रणों का इस्तेमाल धीरे-धीरे समाप्त हो गया है।
वाहन निर्माता अप्रैल 2023 से ही ई20 ईंधन के अनुकूल वाहन बना रहे हैं। अब ई10 और ई20 मिश्रणों को नियामक मान्यता मिलने के बाद वाहनों की उत्सर्जन परीक्षण प्रणाली भी पेट्रोल पंपों पर उपलब्ध ईंधन के अनुरूप हो गई है।
वहीं, 2026 के मध्य में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (आईओसीएल) के चुनिंदा खुदरा बिक्री केंद्रों पर ई85 ईंधन की शुरुआती उपलब्धता के बाद मारुति सुजुकी और टोयोटा जैसी यात्री वाहन निर्माता कंपनियां तथा प्रमुख दोपहिया वाहन निर्माता अपने फ्लेक्स-फ्यूल मॉडल बाजार में उतारने की तैयारी कर रहे हैं।
क्या है फ्लेक्स-फ्यूल?
फ्लेक्स-फ्यूल का अर्थ ऐसे ईंधन से है, जिसमें पेट्रोल, इथेनॉल या दोनों का अलग-अलग अनुपात में इस्तेमाल किया जा सकता है। यह अनुपात वाहन के डिजाइन पर निर्भर करता है।
पेट्रोल कच्चे तेल को रिफाइन करके तैयार किया जाता है, जबकि इथेनॉल एक प्रकार का अल्कोहल है। इसे पौधों में मौजूद शर्करा या स्टार्च के किण्वन (फर्मेंटेशन) से बनाया जाता है। भारत में गन्ना और अनाज इसके प्रमुख स्रोत हैं। इसके अलावा कृषि अपशिष्ट और अन्य वनस्पति पदार्थों से भी इथेनॉल का उत्पादन किया जा सकता है।
हालांकि, पेट्रोल और इथेनॉल के गुण अलग-अलग होते हैं। इसलिए अधिक मात्रा में इथेनॉल इस्तेमाल करने वाले वाहनों के इंजन, ईंधन आपूर्ति प्रणाली और अन्य पुर्जों को उसी के अनुरूप डिजाइन करना जरूरी होता है।
क्या ई100 ईंधन पर कार चलाना सुरक्षित है?
हां, यदि कार को विशेष रूप से ई100 ईंधन के अनुकूल बनाया गया है, तो उसका इंजन लगभग शुद्ध इथेनॉल पर भी चल सकता है। पेट्रोल की तरह इथेनॉल भी ज्वलनशील ईंधन है, लेकिन दोनों के गुणों में अंतर होने के कारण इंजन की बनावट और तकनीक में बदलाव जरूरी होता है।
ईंधन की खपत के लिहाज से इथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में कम ऊर्जा होती है। इसलिए समान ऊर्जा पैदा करने के लिए इंजन को अधिक इथेनॉल की जरूरत पड़ती है। अमेरिकी ऊर्जा विभाग के अनुमान के अनुसार, ई100 में पेट्रोल की तुलना में प्रति गैलन लगभग 30 प्रतिशत कम ऊर्जा होती है। इसका मतलब है कि अधिक इथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन पर वाहन का माइलेज कम हो सकता है। हालांकि, वास्तविक खर्च इंजन की दक्षता और ईंधन की कीमत पर भी निर्भर करता है।
इसके अलावा, इथेनॉल कुछ धातुओं, प्लास्टिक, रबर सील और अन्य पुर्जों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए ईंधन पंप, पाइप, सील और इंजेक्टर को अधिक सांद्रता वाले इथेनॉल के अनुकूल बनाना आवश्यक है।
इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रण प्रणाली में भी बदलाव की जरूरत होती है। सेंसर और इंजन कंट्रोल यूनिट को ईंधन के अनुसार हवा और ईंधन के मिश्रण तथा इग्निशन टाइमिंग को समायोजित करना पड़ता है। अलग-अलग तापमान में इंजन को आसानी से स्टार्ट करने और सुचारु रूप से चलाने के लिए उचित कैलिब्रेशन भी जरूरी है।
इथेनॉल के इस्तेमाल के क्या फायदे हैं?
इथेनॉल की ऑक्टेन रेटिंग अधिक होती है। इससे इंजन में अनियंत्रित दहन यानी नॉकिंग की आशंका कम होती है। नॉकिंग से इंजन को नुकसान पहुंच सकता है। विशेष रूप से इथेनॉल के लिए डिजाइन किया गया इंजन इसकी उच्च ऑक्टेन क्षमता का बेहतर लाभ उठा सकता है।
इसके अलावा, पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में पेट्रोल के एक हिस्से की जगह घरेलू स्तर पर उत्पादित इथेनॉल का इस्तेमाल करने से तेल आयात में कमी आ सकती है।
इससे किसानों और इथेनॉल उत्पादकों के लिए नया बाजार भी तैयार होता है। अंतरराष्ट्रीय संघर्षों और अन्य कारणों से तेल आपूर्ति प्रभावित होने की स्थिति में घरेलू इथेनॉल उत्पादन ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में मददगार हो सकता है।
पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की जरूरत क्यों?
जब शुद्ध इथेनॉल से वाहन चलाना संभव है, तो इसे पेट्रोल में मिलाने की जरूरत क्यों पड़ती है? इसकी एक बड़ी वजह मौजूदा वाहन और ईंधन ढांचा है। देश में अधिकांश वाहन पेट्रोल से चलते हैं और ईंधन आपूर्ति की व्यवस्था भी मुख्य रूप से पेट्रोल पर आधारित है। ऐसे में पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से पूरे वाहन बेड़े को बदले बिना जीवाश्म ईंधन की खपत कम करने का अवसर मिलता है। इससे धीरे-धीरे इथेनॉल आधारित ईंधन की हिस्सेदारी बढ़ाई जा सकती है।
मिश्रित ईंधन की चुनौतियां क्या हैं?
इथेनॉल के बढ़ते इस्तेमाल के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हैं। इनमें सबसे प्रमुख माइलेज में कमी और वाहन के रखरखाव की लागत है। इथेनॉल में प्रति लीटर ऊर्जा कम होने के कारण इसकी मात्रा बढ़ने पर वाहन कम दूरी तय कर सकता है। हालांकि, वाहन चलाने की वास्तविक लागत इस बात पर निर्भर करेगी कि ईंधन की कीमत कितनी है और माइलेज में कितनी कमी आती है। केवल प्रति लीटर कम कीमत होने से प्रति किलोमीटर यात्रा सस्ती होने की गारंटी नहीं है।
वाहनों की अनुकूलता भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। इथेनॉल पुरानी ईंधन प्रणालियों में इस्तेमाल होने वाली कुछ सामग्रियों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए अधिक मात्रा में इथेनॉल मिश्रण के इस्तेमाल के लिए इंजन और ईंधन प्रणाली में जरूरी बदलाव करना पड़ता है।
इसके अलावा, इथेनॉल उत्पादन के लिए कृषि भूमि और पानी की जरूरत होती है। बड़े पैमाने पर उत्पादन बढ़ने से यह सवाल उठता है कि किन फसलों का इस्तेमाल किया जाएगा और क्या इससे खाद्य उत्पादन प्रभावित होगा। उदाहरण के लिए, गन्ने की खेती में काफी पानी खर्च होता है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने भी चेतावनी दी है कि फसल आधारित जैव ईंधन का उत्पादन भूमि उपयोग, जैव विविधता और खाद्य पदार्थों की कीमतों को प्रभावित कर सकता है। इथेनॉल से पर्यावरण को होने वाला वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करता है कि इसका उत्पादन किस तरीके से किया जाता है। इसमें खेती, उत्पादन प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा और परिवहन से होने वाला उत्सर्जन भी शामिल है।
इथेनॉल मिश्रित ईंधन से कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसे कुछ हानिकारक प्रदूषकों के उत्सर्जन में कमी आ सकती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि वाहन प्रदूषण मुक्त हो जाएंगे। पेट्रोल की जगह इथेनॉल इस्तेमाल करने से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी की गारंटी भी नहीं मिलती। इसका परिणाम इथेनॉल के उत्पादन, खेती और परिवहन की प्रक्रिया पर निर्भर करता है।
कार मालिकों को क्या जानना चाहिए?
फिलहाल अधिकांश कार मालिकों के लिए इस बदलाव से कोई सीधा फर्क नहीं पड़ेगा। ई20 ईंधन पर चलने वाली कारें पहले की तरह ई20 का ही इस्तेमाल करेंगी। सामान्य ई20 वाहनों में ई100 ईंधन डालना सुरक्षित नहीं है। जब तक किसी वाहन को विशेष रूप से फ्लेक्स-फ्यूल वाहन के रूप में डिजाइन और प्रमाणित नहीं किया गया है, तब तक उसमें ई85 या ई100 का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
भारत परिवहन क्षेत्र में इथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ाकर आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम कर रहा है। केंद्रीय मोटर वाहन नियमों में किया गया यह संशोधन इसी प्रयास का हिस्सा है। हालांकि, इसका लाभ केवल उन्हीं वाहनों को मिलेगा, जिन्हें निर्माता इन ईंधनों के अनुकूल तैयार करेंगे।
भारत में कौन-सी फ्लेक्स-फ्यूल कारें और दोपहिया वाहन उपलब्ध हैं?
फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को लेकर भारत में वाहन निर्माता कंपनियां नए मॉडल विकसित कर रही हैं। मारुति सुजुकी की वैगनआर फ्लेक्स-फ्यूल को इस क्षेत्र के प्रमुख मॉडलों में गिना जाता है। टाटा मोटर्स, किआ और टोयोटा जैसी कंपनियां भी भविष्य में फ्लेक्स-फ्यूल मॉडल पेश करने की तैयारी कर रही हैं। इनमें किआ सिरोस एफएफवी और टोयोटा इनोवा हाईक्रॉस हाइब्रिड फ्लेक्स-फ्यूल जैसे मॉडल शामिल हैं।
दोपहिया वाहन क्षेत्र में हीरो मोटोकॉर्प ने इस साल जून में स्प्लेंडर प्लस और एचएफ डीलक्स के फ्लेक्स-फ्यूल संस्करण पेश किए। वहीं, सुजुकी जिक्सर का फ्लेक्स-फ्यूल संस्करण भी पहले देश में बिक्री के लिए उपलब्ध रहा है।
