डेस्क : बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (BSEB) में करीब तीन दशक से काम कर रहे तीन कर्मचारियों के खिलाफ कथित फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी हासिल करने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज की गई है। मामला सामने आने के बाद पटना के कोतवाली थाने की पुलिस ने जांच शुरू कर दी है।
तीन कर्मचारियों के खिलाफ दर्ज हुई प्राथमिकी
मामले में जिन कर्मचारियों के नाम सामने आए हैं, उनमें शिव कुमार यादव, माधव यादव और हरिमोहन यादव शामिल हैं। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार तीनों बिहार बोर्ड में पदचर के पद पर कार्यरत थे।
बताया गया है कि शिव कुमार यादव की नियुक्ति 1 जुलाई 1995, माधव यादव की नियुक्ति 1 जुलाई 1994 और हरिमोहन यादव की नियुक्ति 1 अप्रैल 1995 को हुई थी। इस हिसाब से तीनों ने करीब 30 साल से अधिक समय तक बोर्ड में सेवा की है।
सेवा समायोजन के दौरान सामने आया मामला
तीनों कर्मचारियों के शैक्षणिक प्रमाणपत्रों की जांच सेवा समायोजन की प्रक्रिया के दौरान कराई गई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, कर्मचारियों ने वर्ष 2005 में अपने शैक्षणिक प्रमाणपत्र बोर्ड के समक्ष जमा किए थे।
इसके बाद वर्ष 2016 में सेवा समायोजन की प्रक्रिया के तहत इन प्रमाणपत्रों को संबंधित शैक्षणिक संस्थानों से सत्यापित कराया गया। सत्यापन के दौरान संबंधित संस्थानों से प्रमाणपत्रों की वैधता की जानकारी मांगी गई थी।
आरोप है कि संबंधित संस्थानों से इन प्रमाणपत्रों के जारी होने की पुष्टि नहीं हो सकी। इसके बाद बोर्ड स्तर पर मामले में कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हुई।
BSEB की शिकायत पर पुलिस ने शुरू की जांच
इस मामले में बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के प्रभारी प्रशाखा पदाधिकारी की ओर से पटना के कोतवाली थाने में लिखित शिकायत दी गई। इसी शिकायत के आधार पर तीनों कर्मचारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है।
अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि नौकरी के समय कर्मचारियों ने कौन-कौन से दस्तावेज प्रस्तुत किए थे और इन प्रमाणपत्रों का सत्यापन किस स्तर पर हुआ था।
नियुक्ति से जुड़े पुराने रिकॉर्ड भी खंगाले जाएंगे
जांच के दौरान पुलिस कर्मचारियों के नियुक्ति रिकॉर्ड, शैक्षणिक प्रमाणपत्र, सत्यापन रिपोर्ट और सेवा से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल करेगी।
साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि जिन प्रमाणपत्रों पर सवाल उठे हैं, वे कहां से प्राप्त किए गए और इनके आधार पर नियुक्ति की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई।
करीब तीन दशक पुरानी नौकरी पर उठे सवाल
इस मामले की खास बात यह है कि तीनों कर्मचारियों की नियुक्तियां 1994 और 1995 में हुई थीं। यानी जिन नियुक्तियों पर अब सवाल उठे हैं, वे करीब तीन दशक पुरानी हैं।
फिलहाल प्राथमिकी दर्ज होने के बाद मामला पुलिस जांच के चरण में है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि प्रमाणपत्रों की वास्तविक स्थिति क्या थी और इस पूरे मामले में आगे किन लोगों की भूमिका सामने आती है।
आगे क्या होगा?
पुलिस अब दस्तावेजों और प्रमाणपत्रों की जांच करेगी। जांच में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल तीनों कर्मचारियों के खिलाफ फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी हासिल करने का आरोप है; अंतिम निष्कर्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा।
