पटना : बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर सियासी बहस लगातार तेज है। इसी बीच बिहार में SIR की प्रक्रिया और इसके पुराने रिकॉर्ड से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। वर्ष 2025 में बिहार में SIR की प्रक्रिया 24 जून से शुरू होकर 25 जुलाई तक चली थी। उस समय राज्य में करीब 7 करोड़ 89 लाख 69 हजार 844 मतदाता दर्ज थे।
हालांकि, बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की यह पहली प्रक्रिया नहीं थी। इससे पहले वर्ष 2003 में भी बिहार में SIR कराया गया था। उस समय करीब 4 करोड़ 96 लाख मतदाताओं को नोटिफाई किया गया था। वर्ष 2003 में बिहार की मुख्यमंत्री राबड़ी देवी थीं।
2003 में कैसे हुआ था SIR?
वर्ष 2003 में भी मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया अपनाई गई थी। बूथ लेवल ऑफिसर यानी BLO घर-घर जाकर लोगों से संपर्क करते थे और मतदाता सूची को अपडेट करने की प्रक्रिया पूरी की जाती थी।
उस समय भी प्रक्रिया के तहत पहले मतदाता सूची तैयार की जाती थी और इसके बाद उसका ड्राफ्ट प्रकाशित किया जाता था। ड्राफ्ट जारी होने के बाद लोगों के लिए दावा और आपत्ति दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू होती थी।
जिन लोगों का नाम पुरानी मतदाता सूची में नहीं था, वे निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपना दावा पेश कर सकते थे। यदि किसी व्यक्ति का नाम 2003 की मतदाता सूची में नहीं था, लेकिन उसके माता-पिता या परिवार के किसी सदस्य का नाम सूची में दर्ज था, तो संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराकर नाम शामिल कराने का दावा किया जा सकता था।
यानी पुरानी मतदाता सूची को आधार बनाकर नए दावों की जांच और आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने का प्रावधान रखा गया था।
2025 में भी घर-घर पहुंचा BLO
वर्ष 2025 में बिहार में हुई SIR प्रक्रिया के दौरान भी मतदाता सूची को अपडेट करने और पात्र मतदाताओं के नाम सुनिश्चित करने की कवायद की गई। इस दौरान BLO स्तर पर घर-घर जाकर जानकारी जुटाने और आवश्यक दस्तावेजों की प्रक्रिया पूरी करने की व्यवस्था की गई।
SIR के तहत मतदाता सूची से संबंधित दावों, आपत्तियों और सुधार की प्रक्रिया को भी निर्धारित नियमों के अनुसार आगे बढ़ाया गया।
राहुल गांधी के उठाए मामलों पर भी चर्चा
SIR को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ओर से उठाए गए मामलों का भी बयान में उल्लेख किया गया। राहुल गांधी बिहार आए और उन्होंने नवादा के सुबोध कुमार समेत कई लोगों के मामलों को उठाया।
इसके अलावा औरंगाबाद के अमन कुमार, राम इकबाल राय, हरेंद्र राय, लाल मुनी देवी, बच्चियों देवी, लाल बत्ती देवी और पूनम कुमारी जैसे नामों का भी जिक्र किया गया।
बयान में राघोपुर के एक परिवार का भी उल्लेख करते हुए कांग्रेस और आरजेडी पर निशाना साधा गया। दावा किया गया कि जिस क्षेत्र और परिवार की ओर कथित तौर पर लंबे समय तक ध्यान नहीं दिया गया, वहां के कुछ लोगों को दिल्ली बुलाकर मुलाकात और डिनर किया गया। इसके बाद उनके मतदाता सूची में नाम और फोटो को लेकर सवाल उठाए गए।
हालांकि, बयान में यह भी कहा गया कि जैसे ही ये मामले प्रशासन और चुनाव आयोग के अधिकारियों के संज्ञान में आए, संबंधित मामलों की जानकारी लेकर कार्रवाई की गई। यानी जिन नामों या मतदाता सूची से जुड़े मामलों को लेकर सवाल उठाए गए, उनके संबंध में प्रशासनिक स्तर पर जांच और प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।
18 साल से ज्यादा उम्र वालों के नाम कटने का कितना बड़ा दावा?
SIR विवाद के बीच एक अहम सवाल यह भी उठाया गया कि क्या बड़ी संख्या में ऐसे लोग सामने आए हैं, जो 18 वर्ष से अधिक उम्र के होने के बावजूद मतदाता सूची से अपना नाम कटने का दावा कर रहे हैं।
बयान में कहा गया कि पूरी चुनावी प्रक्रिया के दौरान ऐसा कोई बड़ा मामला सामने नहीं आया, जिसमें किसी व्यक्ति ने सामने आकर यह दावा किया हो कि वह बालिग है, उसकी उम्र 18 वर्ष से अधिक है और उसका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया है।
वहीं, पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में शामिल होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि किसी पात्र व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में नहीं है, तो वह निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवेदन देकर अपना नाम जुड़वा सकता है। मतदाता सूची में नाम जोड़ने, सुधार कराने या आपत्ति दर्ज कराने के लिए चुनाव आयोग के नियमों के तहत प्रक्रिया उपलब्ध रहती है।
22 साल में 3 करोड़ से ज्यादा बढ़े मतदाता
बिहार में 2003 और 2025 के SIR के बीच करीब 22 साल का अंतर रहा। 2003 में जहां करीब 4.96 करोड़ मतदाता सूचीबद्ध थे, वहीं 2025 तक यह संख्या बढ़कर करीब 7.90 करोड़ हो गई।
यानी दो दशकों से अधिक समय में बिहार की मतदाता संख्या में करीब 2.94 करोड़ की वृद्धि हुई। मतदाताओं की संख्या में इस बड़ी वृद्धि के साथ मतदाता सूची का पुनरीक्षण प्रशासनिक और चुनावी प्रक्रिया का अहम हिस्सा बन गया है।
अब SIR को लेकर जारी राजनीतिक बहस के बीच 2003 और 2025 की पुनरीक्षण प्रक्रिया, मतदाता संख्या और दावों-आपत्तियों की व्यवस्था की तुलना भी चर्चा के केंद्र में है।
