डेस्क : पटना के चर्चित NEET छात्रा मौत मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की जांच फिलहाल किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सकी है। करीब आठ महीने की जांच के बाद CBI ने पटना की विशेष POCSO अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की है। एजेंसी के मुताबिक, जांच के दौरान किसी व्यक्ति के खिलाफ ऐसा पर्याप्त और ठोस साक्ष्य नहीं मिला, जिसके आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जा सके।
मामला पटना के चित्रगुप्त नगर स्थित शंभू गर्ल्स हॉस्टल का है, जहां जहानाबाद की रहने वाली NEET की तैयारी कर रही छात्रा 6 जनवरी 2026 को संदिग्ध परिस्थितियों में बेहोश मिली थी। इलाज के दौरान 11 जनवरी को उसकी मौत हो गई थी। छात्रा के परिजनों ने दुष्कर्म और हत्या की आशंका जताते हुए मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की थी।
पहले पुलिस जांच पर भी उठे थे सवाल
छात्रा के पिता के बयान पर 9 जनवरी को चित्रगुप्त नगर थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। शुरुआती जांच को लेकर विवाद के बाद मामले की जांच के लिए SIT गठित की गई। जांच के दौरान दो पुलिस अधिकारियों को निलंबित किया गया था। बाद में मामले की गंभीरता को देखते हुए बिहार सरकार ने CBI जांच की सिफारिश की थी।
मामले में हॉस्टल संचालक मनीष रंजन को गिरफ्तार भी किया गया था। हालांकि, निर्धारित अवधि में आरोपपत्र दाखिल नहीं होने के कारण उन्हें नियमित जमानत मिल गई।
मेडिकल और फोरेंसिक रिपोर्ट ने बढ़ाई थी उलझन
मामले की शुरुआत से ही जांच को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते रहे। शुरुआती पुलिस जांच में आत्महत्या की आशंका जताई गई थी, जबकि पोस्टमार्टम और बाद की फोरेंसिक जांच में ऐसे तथ्य सामने आए, जिनसे यौन हिंसा की आशंका को लेकर सवाल उठे। छात्रा के कपड़ों से जैविक सामग्री मिलने की बात भी सामने आई थी। इसके बाद कई लोगों के DNA सैंपल लिए गए, लेकिन CBI की जांच में किसी आरोपी के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य स्थापित नहीं हो सका।
अब 13 अक्टूबर को होगी सुनवाई
CBI की क्लोजर रिपोर्ट दाखिल होने के बाद अब गेंद अदालत के पाले में है। विशेष POCSO अदालत इस रिपोर्ट पर 13 अक्टूबर को सुनवाई करेगी। अदालत ने मामले के सूचक यानी छात्रा के पिता को भी नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है।
कानूनी तौर पर क्लोजर रिपोर्ट का मतलब यह नहीं है कि मामला स्वतः हमेशा के लिए खत्म हो गया। अदालत रिपोर्ट को स्वीकार कर सकती है, अस्वीकार कर सकती है या परिस्थितियों के आधार पर आगे की जांच का निर्देश भी दे सकती है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है—जिस सच की तलाश में जांच एजेंसियां महीनों जुटी रहीं, क्या वह सच अब भी अनसुलझा रहेगा या अदालत की अगली सुनवाई से मामले में कोई नया मोड़ आएगा?
