गया/शेरघाटी : बिहार में सरकारी शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के दावों के बीच गया जिले के शेरघाटी से एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। यहां हटिया मोहल्ले में स्थित करीब 94 साल पुराना ऐतिहासिक मध्य विद्यालय दुल्हिन मंदिर बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है। कभी शिक्षा की अलख जगाने वाला यह विद्यालय आज जर्जर भवन, शिक्षकों की कमी और सीमित संसाधनों के कारण बदहाली का सामना कर रहा है।
विद्यालय में पहली से आठवीं कक्षा तक कुल 254 छात्र-छात्राएं नामांकित हैं, लेकिन उन्हें पढ़ाने के लिए महज तीन शिक्षक कार्यरत हैं। स्कूल में केवल तीन कक्षा-कक्ष और एक कार्यालय उपलब्ध है। ऐसे में आठ कक्षाओं के बच्चों को एक साथ बैठाकर पढ़ाने की मजबूरी बनी हुई है।
तीन कमरों में चल रही आठ कक्षाओं की पढ़ाई
विद्यालय की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पहली से चौथी कक्षा तक के बच्चों को एक ही कमरे में बैठाया जाता है। वहीं, पांचवीं और छठी के विद्यार्थी दूसरे कमरे में तथा सातवीं और आठवीं के बच्चे तीसरे कमरे में पढ़ाई करते हैं।
इस व्यवस्था के कारण बच्चों को अपनी कक्षा के अनुसार पढ़ाई करने में परेशानी होती है। वहीं, शिक्षकों के सामने भी अलग-अलग कक्षाओं का पाठ्यक्रम पूरा कराने की चुनौती बनी रहती है। विद्यालय में नामांकित 254 बच्चों में 219 लड़के और 35 लड़कियां शामिल हैं।
न शौचालय की बेहतर व्यवस्था, न खेल का मैदान
स्कूल में केवल शिक्षकों और कमरों की कमी ही समस्या नहीं है, बल्कि बच्चों के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाएं भी पर्याप्त नहीं हैं। विद्यालय परिसर में खेल का मैदान नहीं है। शौचालय की स्थिति भी संतोषजनक नहीं बताई जा रही है।
इसके अलावा, मध्याह्न भोजन तैयार करने के लिए रसोइया का अलग कमरा तक उपलब्ध नहीं है। बच्चों को भोजन कराने के लिए भी अलग स्थान नहीं होने के कारण कक्षा-कक्ष में ही बेंच पर बैठाकर खाना खिलाया जाता है। इससे पढ़ाई और भोजन दोनों के लिए सीमित जगह का इस्तेमाल करना पड़ता है।
पुराने भवन के कमरे भी जर्जर हो चुके हैं। पर्याप्त कक्षा-कक्ष, बरामदा और अन्य जरूरी संरचनाओं के अभाव में बच्चों को बेहतर शैक्षणिक माहौल नहीं मिल पा रहा है।
15 डिसमिल जमीन के बावजूद नए भवन का इंतजार
विद्यालय के पास करीब 15 डिसमिल जमीन उपलब्ध बताई जाती है, लेकिन पूरी जमीन विद्यालय के वास्तविक कब्जे और उपयोग में नहीं है। विद्यालय के बगल में मंदिर के नाम से खाली जमीन भी मौजूद है। जमीन की स्थिति स्पष्ट नहीं होने और उसकी विधिवत मापी नहीं होने के कारण नए भवन का निर्माण अटका हुआ है।
विद्यालय के प्रभारी प्रधानाध्यापक युगेश प्रसाद के अनुसार, जमीन की मापी और भवन निर्माण की समस्या को लेकर जुलाई महीने में अंचलाधिकारी को लिखित आवेदन दिया गया था। इसके साथ ही शिक्षा विभाग के प्रखंड से लेकर जिला स्तर के अधिकारियों और मगध प्रमंडल के आयुक्त तक को विद्यालय की समस्याओं से अवगत कराया गया है।
प्रधानाध्यापक का कहना है कि बच्चों की संख्या के अनुपात में कमरे और शिक्षक दोनों कम हैं। तीन कमरों में आठ कक्षाओं का संचालन करना पड़ रहा है। खेल मैदान, शौचालय और रसोइया के लिए अलग कमरे जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं।
आजादी से पहले से शिक्षा की अलख जगा रहा विद्यालय
मध्य विद्यालय दुल्हिन मंदिर का इतिहास भी काफी पुराना है। स्थानीय निवासी विजय कुमार दत्त के अनुसार, वर्तमान सरकारी विद्यालय के स्वरूप से पहले यहां संस्कृत पाठशाला संचालित होती थी।
शेरघाटी के तत्कालीन जमींदार परिवार की गणेश कुंवर, जिन्हें स्थानीय लोग सम्मान से दुल्हिन जी कहते थे, ने दुल्हिन मंदिर परिसर में मंदिर का निर्माण कराया था। इसी परिसर में बच्चों की शिक्षा के लिए पाठशाला भी संचालित होती थी।
बताया जाता है कि तत्कालीन जमींदार डोमन बाबू ने क्षेत्र में शिक्षा की कमी को देखते हुए कुछ बच्चों को पढ़ाने की पहल की थी। धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ी तो उन्होंने विद्यालय के लिए जमीन उपलब्ध कराने का आग्रह किया। इसके बाद दुल्हिन जी ने मंदिर और पाठशाला के संचालन तथा रखरखाव के लिए जमीन दान की थी।
शुरुआत में यहां संस्कृत की पढ़ाई होती थी। बाद में इसका स्वरूप बदलकर सामान्य हिंदी विद्यालय के रूप में विकसित हुआ। आजादी के बाद सरकारी मान्यता मिलने पर प्राथमिक विद्यालय के रूप में पढ़ाई शुरू हुई। समय के साथ इसका विस्तार हुआ और यह मध्य विद्यालय बन गया।
स्थानीय लोगों के अनुसार, विद्यालय ने अपने सफर में झोपड़ी और खपरैल के भवन से लेकर पक्के भवन तक का दौर देखा है। वर्ष 1932 को इसकी स्थापना का वर्ष बताया जाता है, हालांकि शुरुआती शैक्षणिक गतिविधियां इससे पहले शुरू हो गई थीं।
सरकारी निर्देश के बाद भी जमीन की मापी का इंतजार
राज्य के भवनहीन सरकारी विद्यालयों के लिए जमीन की उपलब्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से विकास आयुक्त मिहिर कुमार सिंह ने 29 अक्टूबर को सभी जिलाधिकारियों को पत्र जारी किया था। इसमें दान में मिली जमीन की मापी कराने और उस पर विद्यालय का कब्जा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया था, ताकि जरूरत के अनुसार नए भवन का निर्माण कराया जा सके।
ऐसे में दुल्हिन मंदिर मध्य विद्यालय की जमीन की मापी और नए भवन का मामला महत्वपूर्ण हो गया है।
करीब 94 वर्षों से क्षेत्र में शिक्षा की अलख जगा रहे इस ऐतिहासिक विद्यालय की मौजूदा स्थिति कई सवाल खड़े करती है। 254 बच्चों की पढ़ाई महज तीन कमरों और तीन शिक्षकों के भरोसे है। अब सवाल यह है कि विद्यालय की जमीन की मापी कब होगी, नए भवन का निर्माण कब शुरू होगा और बच्चों को पर्याप्त शिक्षक एवं बुनियादी सुविधाएं कब मिलेंगी?
अभिभावकों और स्थानीय लोगों को अब जिला प्रशासन तथा शिक्षा विभाग की ठोस पहल का इंतजार है।







