Bihar School Education: बिहार के सरकारी स्कूलों में कक्षा 1 और 2 के बच्चों की पढ़ाई को आसान बनाने के लिए शिक्षा विभाग ने बड़ी पहल की है। अब छोटे बच्चों को हिंदी के साथ उनकी स्थानीय भाषाओं में भी पढ़ाया जाएगा। इसके लिए विभाग करीब 40 लाख विद्यार्थियों को 1.20 करोड़ मुफ्त किताबें उपलब्ध कराने की तैयारी कर रहा है। पहले चरण में मैथिली, भोजपुरी, सुरजापुरी, बज्जिका, अंगिका और मगही भाषाओं में पुस्तकें तैयार की जाएंगी। इन किताबों की छपाई पर करीब 250 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
शिक्षा विभाग ने इसके लिए पाठ्यक्रम तैयार कराने और पुस्तकों की छपाई शुरू करने के निर्देश दिए हैं। किताबें हिंदी, अंग्रेजी और गणित विषयों की होंगी। अंग्रेजी और गणित की पढ़ाई का आधार पहले की तरह ही रहेगा, जबकि हिंदी विषय की पढ़ाई स्थानीय भाषाओं के सहयोग से भी कराई जाएगी। इससे पहली बार स्कूल आने वाले बच्चों को पढ़ाई समझने में आसानी होगी।
मातृभाषा में पढ़ाई से मजबूत होगी बच्चों की समझ
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) में शुरुआती कक्षाओं में मातृभाषा या स्थानीय भाषा के माध्यम से शिक्षा देने पर जोर दिया गया है। इसी के अनुरूप बिहार में यह पहल की जा रही है। शिक्षा विभाग का मानना है कि छोटे बच्चों के लिए स्कूल में पढ़ाई शुरू करने के दौरान भाषा सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चे घर पर मैथिली, भोजपुरी, मगही, अंगिका और बज्जिका जैसी भाषाएं बोलते हैं। लेकिन स्कूल पहुंचने पर उन्हें मानक हिंदी और अंग्रेजी में पढ़ाई करनी पड़ती है। ऐसे में कई बच्चों को शुरुआती पाठ समझने में परेशानी होती है। स्थानीय भाषा में पढ़ाई होने से वे आसानी से विषयों को समझ सकेंगे और कक्षा में अधिक सक्रिय रूप से भाग ले पाएंगे।
शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने कहा है कि छोटे बच्चों को विषयों की बेहतर समझ विकसित कराने के लिए स्थानीय भाषाओं में भी पढ़ाई कराई जाएगी। इसके लिए पाठ्यक्रम तैयार कर पुस्तकों की छपाई कराई जाएगी।
इलाके के हिसाब से तैयार होंगी किताबें
शिक्षा विभाग अलग-अलग जिलों में प्रचलित भाषाओं और बोलियों को ध्यान में रखकर पाठ्य सामग्री तैयार कर रहा है। इसके तहत बच्चों को अपने आसपास बोली जाने वाली भाषा में पढ़ने का अवसर मिलेगा।
- भोजपुरी: भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर, सारण, सीवान और गोपालगंज के सरकारी स्कूलों में भोजपुरी आधारित पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी।
- मैथिली: दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सहरसा, सुपौल और मधेपुरा के प्राथमिक स्कूलों के लिए मैथिली में किताबें तैयार होंगी।
- मगही: गया, पटना के ग्रामीण क्षेत्रों, जहानाबाद, अरवल, औरंगाबाद और नवादा के बच्चों के लिए मगही परिवेश से जुड़े पाठ शामिल किए जाएंगे।
- अंगिका: भागलपुर, बांका, मुंगेर, लखीसराय और जमुई के अंगिका भाषी क्षेत्रों को ध्यान में रखकर पुस्तकें तैयार होंगी।
- बज्जिका: मुजफ्फरपुर, वैशाली, सीतामढ़ी और शिवहर के बज्जिका भाषी क्षेत्रों के बच्चों के लिए विशेष पाठ होंगे।
- सुरजापुरी और जनजातीय भाषाएं: सीमांचल और जनजातीय क्षेत्रों के लिए स्थानीय शब्दावली के साथ संथाली और उरांव जैसी भाषाओं का भी ध्यान रखा जाएगा।
किताबों में दिखेगी बिहार की लोक-संस्कृति
इन पुस्तकों की खास बात यह होगी कि ये केवल हिंदी के पाठों का स्थानीय भाषाओं में अनुवाद नहीं होंगी। इनमें बिहार की लोक-संस्कृति, लोककथाओं, बालगीतों, पहेलियों और पारंपरिक खेलों को भी जगह दी जाएगी।
मिथिलांचल से जुड़ी पुस्तकों में मिथिला चित्रकला, स्थानीय पर्व-त्योहारों और परंपराओं के चित्र शामिल होंगे। वहीं, मगध और शाहाबाद क्षेत्र की किताबों में स्थानीय लोकनाट्य, ऋतुगीत और वनस्पतियों से जुड़े उदाहरण दिए जाएंगे।
बच्चों को पढ़ाई के प्रति आकर्षित करने के लिए किताबों के 60 से 70 प्रतिशत पन्नों पर बड़े और रंगीन चित्र रखने की योजना है। पहेलियों, अंताक्षरी और स्थानीय खेलों के माध्यम से पढ़ाई को रोचक बनाया जाएगा। मिट्टी के खिलौने बनाने जैसी गतिविधियों को भी पाठ्य सामग्री में शामिल किया जाएगा। कबड्डी और गिल्ली-डंडा जैसे परिचित खेलों के उदाहरणों से जोड़-घटाव समझाने की तैयारी है।
250 करोड़ रुपये होंगे खर्च, 40 लाख बच्चों को मिलेगा लाभ
इस योजना के तहत करीब 40 लाख बच्चों के लिए लगभग 1.20 करोड़ किताबें छापी जाएंगी। इस पर करीब 250 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इसका उद्देश्य बच्चों को उनकी मातृभाषा और स्थानीय परिवेश से जोड़कर शुरुआती शिक्षा की नींव मजबूत करना है।
कुल मिलाकर, बिहार सरकार की यह पहल प्राथमिक शिक्षा में बड़ा बदलाव ला सकती है। स्थानीय भाषा में पढ़ाई से बच्चों की सीखने की क्षमता, आत्मविश्वास और स्कूल के प्रति रुचि बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है।







