नई दिल्ली : ‘वंदे मातरम’ के सभी छह पदों को गाने की व्यवस्था और इसे नहीं गाने पर संभावित आपराधिक कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को अहम सुनवाई हुई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह यह तय नहीं करेगा कि राष्ट्रगीत के कितने पद होने चाहिए। यह निर्णय लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार और संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। हालांकि, धार्मिक विश्वास या अंतरात्मा की आपत्ति के कारण ‘वंदे मातरम’ नहीं गाने वाले व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है या नहीं, इस मुद्दे की कोर्ट जांच करेगा।
टीएम कृष्णा की याचिका पर सुनवाई
यह मामला कर्नाटक संगीत के प्रसिद्ध गायक टी.एम. कृष्णा की याचिका से जुड़ा है। उन्होंने 2026 में किए गए Prevention of Insults to National Honour Act में संशोधन और गृह मंत्रालय की ओर से ‘वंदे मातरम’ के सभी छह पदों को निर्धारित अवसरों पर गाने संबंधी निर्देशों को चुनौती दी है।
याचिका में तर्क दिया गया है कि गीत के अंतिम चार पदों में धार्मिक संदर्भ हैं, जिसके कारण कुछ लोगों की धार्मिक मान्यताओं से टकराव हो सकता है। याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि धार्मिक स्वतंत्रता और अंतरात्मा की स्वतंत्रता के बावजूद किसी व्यक्ति को राष्ट्रगीत न गाने के लिए दंडित किया जा सकता है या नहीं।
धार्मिक कारणों से न गाने पर सजा का मुद्दा अहम
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल हैं, ने कहा कि इस मामले में 1986 के बिजो इमैनुएल बनाम केरल फैसले में तय कानूनी सिद्धांत महत्वपूर्ण रहेगा।
उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाने वाले विद्यार्थियों को संरक्षण दिया था, बशर्ते वे राष्ट्रगान के प्रति सम्मान प्रदर्शित करते हों। मौजूदा सुनवाई में भी कोर्ट ने संकेत दिया कि किसी व्यक्ति की धार्मिक आस्था या अंतरात्मा की आपत्ति के कारण उसे आपराधिक दंड का सामना नहीं करना चाहिए।
‘2 या 6 पद’ पर कोर्ट नहीं देगा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि ‘वंदे मातरम’ के कितने पद आधिकारिक रूप से गाए जाएं, यह तय करना अदालत का काम नहीं है। पीठ के अनुसार, राष्ट्रगीत और उससे जुड़ी राष्ट्रीय आकांक्षाओं को किस तरह निर्धारित किया जाए, यह लोकतांत्रिक सरकार के अधिकार क्षेत्र का विषय है।
कोर्ट का फोकस इस बात पर रहेगा कि यदि कोई व्यक्ति धार्मिक विश्वास या अंतरात्मा की आपत्ति के कारण राष्ट्रगीत नहीं गाता, तो क्या उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
याचिकाकर्ता की ओर से क्या दलील दी गई?
टी.एम. कृष्णा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने ‘वंदे मातरम’ को पहले दो पदों तक सीमित रखने की दलील दी। उन्होंने 1937 में कांग्रेस कार्य समिति के उस निर्णय का हवाला दिया, जिसमें राष्ट्रीय कार्यक्रमों के संदर्भ में पहले दो पदों के इस्तेमाल की बात सामने आई थी।
दलील के दौरान यह भी कहा गया कि सभी छह पदों को अनिवार्य करने और इसके साथ दंडात्मक प्रावधान जोड़ने से धार्मिक स्वतंत्रता तथा अंतरात्मा की स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक सवाल पैदा होते हैं।
केंद्र से दो हफ्ते में जवाब मांगा
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार से दो सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध किया।
फिलहाल कोर्ट ने ‘वंदे मातरम’ के पदों की संख्या को लेकर कोई फैसला नहीं दिया है। सुनवाई का प्रमुख संवैधानिक सवाल यह है कि धार्मिक विश्वास या अंतरात्मा की आपत्ति के कारण राष्ट्रगीत नहीं गाने वाले व्यक्ति को आपराधिक दंड का सामना करना चाहिए या नहीं।
