गयाजी : पितृपक्ष के दौरान मोक्षनगरी गयाजी श्रद्धा, आस्था और आध्यात्मिकता के केंद्र में बदल जाती है। देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मिक शांति और मोक्ष की कामना लेकर गया पहुंचते हैं। फल्गु नदी के तट से लेकर विष्णुपद मंदिर और विभिन्न पिंडवेदी स्थलों तक पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म का सिलसिला चलता है। बिहार पर्यटन के अनुसार, गया में पिंडदान के लिए 48 प्रमुख वेदियां मानी जाती हैं, जिनमें फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर, अक्षयवट और सीता कुंड जैसे स्थल प्रमुख हैं।
पितृपक्ष में क्यों खास है गयाजी?
हिंदू धार्मिक परंपरा में पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने का विशेष समय माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि गया में पिंडदान और तर्पण करने से पितरों को सद्गति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इसी आस्था के कारण पितृपक्ष के दौरान गयाजी में देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। 2026 के पितृपक्ष मेले के शुरुआती दिनों में भी फल्गु नदी के घाटों और विष्णुपद मंदिर क्षेत्र में बड़ी संख्या में श्रद्धालु नजर आए।
विष्णुपद मंदिर का क्या है महत्व?
फल्गु नदी के तट पर स्थित विष्णुपद मंदिर गयाजी के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में से एक है। मंदिर में काले बेसाल्ट पत्थर पर भगवान विष्णु के चरणचिह्न माने जाने वाले निशान मौजूद हैं।
गया जिला प्रशासन की वेबसाइट के अनुसार, धार्मिक मान्यता में इन चरणचिह्नों को भगवान विष्णु से जोड़ा जाता है। पौराणिक कथा के मुताबिक भगवान विष्णु ने गयासुर की छाती पर अपना पैर रखा था। इसी धार्मिक परंपरा से विष्णुपद नाम जुड़ा माना जाता है।
वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण 18वीं शताब्दी में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा कराया गया था। आज यह मंदिर गयाजी आने वाले श्रद्धालुओं की धार्मिक यात्रा का प्रमुख केंद्र है।
पिंडदान और विष्णुपद का संबंध
पितृपक्ष के दौरान श्रद्धालु फल्गु नदी के तट पर तर्पण और पिंडदान करने के बाद विष्णुपद मंदिर में भगवान विष्णु के चरणों का दर्शन करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गया में किया गया श्राद्ध कर्म पितरों की शांति और मोक्ष से जुड़ा हुआ है।
बिहार पर्यटन विभाग भी गया को पिंडदान और श्राद्ध कर्म के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल करता है। यहां फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर, सीता कुंड और अन्य वेदियों पर अलग-अलग धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं।
राम और सीता से भी जुड़ी है मान्यता
गयाजी की धार्मिक परंपरा का संबंध भगवान राम और माता सीता से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि भगवान राम ने गया में अपने पिता राजा दशरथ के लिए पिंडदान किया था। फल्गु नदी के किनारे माता सीता से जुड़ी पिंडदान की परंपरा भी आज तक श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।
इसी कारण गयाजी केवल एक तीर्थस्थल नहीं, बल्कि पितृ परंपरा, धार्मिक स्मृतियों और सदियों पुरानी आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
पितृपक्ष में बदल जाता है गयाजी का स्वरूप
पितृपक्ष के दौरान गयाजी में सुबह से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही शुरू हो जाती है। फल्गु नदी के घाटों पर तर्पण, देवघाट सहित विभिन्न स्थानों पर पिंडदान और विष्णुपद मंदिर में दर्शन का क्रम चलता रहता है।
2026 के पितृपक्ष में शुरुआती दिनों में ही बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों के पहुंचने की खबर सामने आई है। विष्णुपद मंदिर क्षेत्र में दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की कतारें भी देखी गईं।
आस्था के साथ बढ़ती सुविधाएं
पितृपक्ष मेले में आने वाले श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए प्रशासन और राज्य सरकार की ओर से आवास, स्वास्थ्य, यातायात और अन्य सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है। बिहार पर्यटन की जानकारी के अनुसार, पितृपक्ष के दौरान श्रद्धालुओं के लिए अस्थायी आवास, सामुदायिक भोजन, स्वास्थ्य शिविर और यातायात व्यवस्था जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।
2026 में गयाजी के धार्मिक पर्यटन और तीर्थयात्रा सुविधाओं को विस्तार देने के लिए विष्णुपद कॉरिडोर की आधारशिला रखे जाने की भी जानकारी सामने आई है।
गयाजी क्यों आता है हर साल आस्था का सैलाब?
गया की धार्मिक पहचान केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है। फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर, अक्षयवट, सीता कुंड और विभिन्न पिंडवेदी स्थल मिलकर इसे पितृ कर्म की एक विस्तृत धार्मिक परंपरा का केंद्र बनाते हैं।
पितृपक्ष के दौरान यहां पहुंचने वाला हर श्रद्धालु अपने साथ अपने परिवार और पूर्वजों से जुड़ी एक आस्था लेकर आता है। यही वजह है कि पितृपक्ष में गयाजी का वातावरण श्रद्धा, मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठानों से पूरी तरह बदल जाता है।
गयाजी की पहचान इसलिए सिर्फ एक तीर्थस्थल के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय पितृ परंपरा और सदियों पुरानी धार्मिक आस्था के जीवंत केंद्र के रूप में भी होती है।
